Wednesday, January 11, 2017

अजित सिंह बोले, भाजपा को हराने के लिए कुछ भी करने को तैयार हूं

राष्ट्रीय लोक दल के मुखिया चौधरी अजित सिंह ने रविवार को बस्ती में कहा कि भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए वे कुछ भी करने को तैयार हैं। अक्सर सांप्रदायिक दंगे कराकर सत्ता में आने वाली भाजपा को इस बार किसी भी सूरत में प्रदेश में आने से रोकना है। 2019 में दोबारा केन्द्र पर शासन करने का उसका सपना चकनाचूर करना है।

राजा ऐश्वर्यराज सिंह द्वारा बस्ती में आयोजित किसान अधिकार रैली में अजित सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गलत बयानबाजी करते हैं। प्रधानमंत्री ने सहारनपुर में गन्ना किसानों का पूरा कर्जा माफ कर दिए जाने की बात कही थी जबकि हकीकत यह है कि आज भी किसान हजारों करोड़ रुपए के कर्ज में डूबे हैं। दो साल में ढाई करोड़ युवाओं की जगह महज 1.35 लाख युवाओं को ही रोजगार मिला है।

उन्होंने किसानों का आह्वान किया कि वह पूरा कर्जा माफ करने और प्रदेश-देश में अपनी सरकार बनाने के लिए रालोद को जिताएं। भाजपा को हराने में पूरी ताकत से जुट जाएं। सपा और कांग्रेस से गठबंधन की बात को वह नकार गए।

Tuesday, January 10, 2017

प्रत्याशियों के चयन के लिए अधिकृत किए गए भाजपा प्रदेश अध्यक्ष

भारतीय जनता पार्टी की मंगलवार को हुई चुनाव समिति की बैठक में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य को सभी 403 विधानसभा सीटों पर प्रत्याशियों के चयन के लिए अधिकृत कर दिया गया। बैठक में विधानसभा की हर सीट को लेकर विस्तार से चर्चा हुई।

संसदीय की बोर्ड की बैठक 14 या 15 जनवरी कोपार्टी सूत्रों के अनुसार भाजपा के बड़े नेताओं ने तीन सर्वे रिपोर्टों के आधार पर और कई चरणों में चली आपसी बातचीत में प्रत्याशी तय कर लिए हैं।

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष को प्रत्याशियों के नामों को केंद्रीय संसदीय बोर्ड के सामने ले जाने के लिए अधिकृत किया गया है। केन्द्रीय संसदीय बोर्ड की बैठक भी मकर संक्रान्ति के मौके पर 14 या 15 जनवरी को होगी। बैठक में प्रत्याशियों के नामों पर आखिरी मुहर लगेगी। इसके बाद नाम घोषित किए जाएंगे।अपना दल को आठ और भासपा को चार सीटेंसूत्रों के अनुसार चुनाव समिति की बैठक में अपना दल की अनुप्रिया पटेल की पार्टी के लिए उसकी संसदीय सीटों के आधार पर सीटें देने का मानक तय किया है। अपना दल के पास दो संसदीय सीटें हैं। इस आधार पर उसे आठ सीटें दिया जाना तय माना जा रहा है।

इसके अलावा ओम प्रकाश राजभर की भारतीय समाज पार्टी को चार के आसपास सीटें दी जा सकती हैं।मोदी व अमित की होंगी धुआंधार रैलियांबैठक में चुनाव के दौरान चलने अभियानों और चुनाव प्रचार के तरीकों पर भी विचार हुआ। तय किया गया कि प्रत्याशियों की घोषणा के साथ ही पार्टी के स्टार प्रचारक पीएम नरेन्द्र मोदी व अमित शाह की धुआंधार जनसभाएं लगाई जाएंगी।

बैठक में भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व प्रदेश प्रभारी ओम प्रकाश माथुर, पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य, राष्ट्रीय सहसंगठन मंत्री शिव प्रकाश, केन्द्रीय मंत्री कलराज मिश्र, प्रदेश महामंत्री संगठन सुनील बंसल समेत कई नेता शामिल हुए।

राजनीतिक दलों के दफ्तरों पर राज्य सम्पत्ति विभाग रखेगा नजर

आदर्श आचार संहिता का पालन कराने के लिए अब राजनीतिक दलों के मुख्यालयों पर भी आयोग की नजर है। किसी भी पार्टी मुख्यालय पर ऐसा कोई होर्डिंग, बैनर या पोस्टर जिससे प्रचार हो रहा हो उसे हटाया जा रहा है।

इसके लिए राज्य सम्पत्ति विभाग, पीब्ल्यूडी समेत अन्य विभागों को जिला प्रशासन से निर्देश जारी कर दिए गए हैं। क्योंकि प्रमुख पार्टियों के मुख्यालय इन्हीं विभागों की इमारतों से संचालित हो रहे हैं। वहीं, प्रशासन की राजनीतिक पार्टियों के साथ बैठक के बाद सपा मुख्यालय के सामने स्थित झंडे, बैनर, पोस्टर की दुकानों को ढक दिया गया है।

पार्टी मुख्यालयों पर सिर्फ ऐसे बोर्ड की अनुमति है जिससे यह पता चलता हो कि फलां पार्टी का दफ्तर इस स्थान पर है। इसके अलावा राज्य या केन्द्र सरकार की किसी योजना का प्रचार, किसी नेता का प्रचार करने वाली होर्डिंगों को तत्काल हटाने का निर्देश है। एक दिन पहले ही भाजपा दफ्तर के बाहर लगी एलईडी को ढकवा दिया गया था।

एडीएम प्रशासन अविनाश सिंह ने बताया कि राज्य सम्पत्ति विभाग, पीडब्ल्यूडी, लेसा, आवास विकास, नगर निगम आदि विभागों को निर्देश दिया गया है। इसमें कहा गया है कि सभी विभाग अपने स्वामित्व वाली इमारतों, सड़कों, फुटपाथ और दीवारों से पोस्टर बैनर हटवा दें। लेसा से कहा गया है कि बिजली के खंभों, ट्रांसफार्मरों से प्रचार सामग्री या पोस्टर आदि तत्काल हटा दें।

आयोग के निर्देश पर निकाला गया आदर्श आचार संहिता रथ

मलिहाबाद में आम लोगों व राजनीतिक दलों को जागरूक करने के लिए रविवार को आदर्श आचार संहिता रथ निकाला गया। एसडीएम मलिहाबाद नीता यादव ने इस रथ को हरी झंडी दिखा कर रवाना किया। इस मौके पर तहसीलदार संतोष कुमार राय समेत अन्य तहसील कर्मचारी भी मौजूद थे।

दलित खुद अपनी ताकत बनें : राज बब्बर





प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर ने राज्य के दलितों का आह्वान करते हुए उन्हें लामबंद होने की सीख देते हुए कहा है कि वह अपनी एकता को इतना मजबूत बनाएं ताकि कोई उन्हें अपना साधन न बना सके। बब्बर मंगलवार को लखनऊ में पार्टी की ओर से शुरू की गई दलित स्वाभिमान यात्रा के समापन समारोह को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने प्रदेश के दलितों से कहा कि आपके बहुमत के सहारे लोग जीतते हैं अब आपको खुद जीतने की जरूरत है और खुद जीतने की ताकत बनो ताकि दूसरा कोई आपको मोहरा न बना सके। उन्होंने दलित समुदाय का आह्वान किया कि आज बाबा साहब की नीतियों पर चलने का प्रण लेकर जाए और कांग्रेस पार्टी और उत्तर प्रदेश को बेहतर बनाने का काम करें। सांसद पीएल पुनिया ने कहा कि प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय के इसी परिसर से बीती 4 दिसम्बर को शिक्षा-सुरक्षा-स्वाभिमान यात्रा शुरू हुई थी।

6 दिसम्बर को बाबा साहब के निर्वाण दिवस पर सभी जिलों में निर्वाण दिवस मनाकर बाबा साहब को याद किया गया। यह यात्रा चालीस दिनों में लगभग साढ़े तीन लाख किलोमीटर की रही और हर जिले में 130 यात्राएं हुईं। इस यात्रा को बड़ी कामयाबी मिली। पार्टी के अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय चेयरमैन के. राजू ने कहा कि राहुल गांधी का सपना है कि देश के हर राज्य में दलित नेतृत्व आगे आए और राजनीति, सरकार हर जगह शामिल हो।

उन्होंने कहा कि यूपी में बसपा सिर्फ पैदा इसलिए हुई क्योंकि कांग्रेस पार्टी से दलित दूर हो गई थी। इस अवसर पर सांसद प्रमोद तिवारी, पूर्व केन्द्रीय मंत्री जे.डी. शीलम, विभाग के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ब्रजलाल खाबरी एवं विभाग के प्रान्तीय चेयरमैन भगवती प्रसाद चौधरी, वरिष्ठ उपाध्यक्ष डा. संतोष सिंह, पूर्व मंत्री रामकृष्ण द्विवेदी, सत्यदेव त्रिपाठी, राजबहादुर, ए.आई.सी.सी. अनु जाति विभाग के कोआर्डिनेटर शशांक शुक्ला आदि वरष्ठि नेता मौजूद रहे।

Monday, February 1, 2016

बीजेपी की दलित राजनीति को लेकर नई पहल

बीजेपी दलित राजनीति को लेकर नई पहल की तैयारी कर रही है। उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए पार्टी ने राज्य में दलितों को अपने साथ जोड़ने की कवायद शुरू कर दी है। इसकी कमान खुद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह संभालने जा रहे हैं।

24 फरवरी को करेंगे अमित शाह यूपी का दौरा

पार्टी सूत्रों के मुताबिक, अमित शाह 24 फरवरी को यूपी का दौरा करेंगे। इसी दिन बलरामपुर में पार्टी के जिला कार्यालय की इमारत का भूमि पूजन करेंगे और बहराइच में राजा सुहेल देव की स्मृति में एक कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे। ये दोनों ही कार्यक्रम सांकेतिक होने के साथ बेहद महत्वपूर्ण भी हैं। अध्यक्ष की कमान दोबारा संभालने के बाद शाह ने पूरे देश में हर जिले में पार्टी कार्यालय की इमारत बनाने का काम शुरू किया है। बलरामपुर का कार्यक्रम इसी का हिस्सा है, जबकि बहराइच के कार्यक्रम से उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति में बीजेपी के एक नए अध्याय की शुरुआत होगी।

जानें कौन हैं सुहेल देव
दरअसल, 11वीं शताब्दी के राजा सुहेल देव पासी और भर समाज के प्रमुख प्रतीकों में से एक हैं। राज्य की करीब बीस फीसदी दलित आबादी में 16 फीसदी संख्या के साथ पासी दूसरी सबसे बड़ी उपजाति है। उत्तर प्रदेश में पासी समाज के मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए राजनीतिक दल राजा सुहेल देव के नाम का प्रयोग करते रहे हैं। बहुजन समाज पार्टी ने सरकार बनने पर राज्य भर में कई जगह राजा सुहेल देव की प्रतिमाओं की स्थापना की थी। बीजेपी और उसके सहयोगी हिंदूवादी संगठन भी राजा सुहेल देव को इतिहास में जगह दिलाने की लड़ाई लड़ते रहे हैं। उनकी दलील है कि इस्लामी आक्रमणकारियों को खदेड़ने में राजा सुहेल देव की भूमिका को रेखांकित करना जरूरी है।

माना जाता है कि महमूद गजनवी के भांजे सैय्यद सालार मसूद गाजी ने उसकी मौत के बाद एक लाख सैनिकों के साथ हमला बोला। इस सेना ने दिल्ली, मेरठ, कन्नौज और मलिहाबाद का रास्ता तय किया मगर बाद में बहराइच के नजदीक राजा सुहेल देव ने इसका रास्ता रोका। एक विशाल सेना का मुकाबला छोटी सेना ने किया और उसे परास्त कर दिया।

सुहेल देव की विरासत को लेकर दलित सियासत
राजा सुहेल देव की इसी विरासत को लेकर दलित सियासत भी अलग-अलग रूप में आती रही है। खासतौर से तब जबकि उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने हैं, प्रतीकों को लेकर राजनीति तेज हो रही है। मायावती की बीएसपी के लिए ये चुनाव बेहद अहम हैं, क्योंकि लोकसभा चुनाव में बीस फीसदी वोट हासिल करने के बावजूद वो एक भी सीट नहीं जीत सकी थीं। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित राज्य की सभी 17 सीटों पर बीजेपी ने जीत हासिल की और इस तरह उसने मायावती के दलित वोट बैंक में सेंध भी लगाई। 24 फरवरी का कार्यक्रम बीजेपी का दलितों में अपना जनाधार मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा ही माना जा रहा है।


आखिरकार अखिलेश यादव बन ही गए मुख्यमंत्री...

हाल ही में मुलायम सिंह ने अखिलेश के तीन करीबी नेताओं को पार्टी विरोधी गतिविधियों की वजह से निकाल दिया था। अपने चहेते सुनील सिंह साजन, आनंद भदौरिया और सुबोध यादव के निकाले जाने से नाराज़ अखिलेश ने पिछले साल 26 दिसंबर से शुरू हुए सैफई महोत्सव का बहिष्कार कर इसे प्रतिष्ठा का मुद्दा बना लिया था। यह पहला मौका था, जब अखिलेश ने खुलकर पार्टी और अपने पिता के खिलाफ बगावत की। पांच दिन बाद जब अखिलेश सैफई गए तो कयास लगाया गया कि उनके करीबियों की वापसी पर पिता-पुत्र में समझौता हो गया है और वैसा ही हुआ। मुलायम सिंह को सुनील सिंह, सुबोध यादव और आनंद भदौरिया को पार्टी में वापस लेना पड़ा। इससे पहले जब प्रदेश में मंत्रिमंडल में फेरबदल हुआ तो मुलायम के कई करीबी मंत्रियों के पर कतरे गए या उन्हें हटा दिया गया और उनकी जगह सीएम ने अपने लोगों को शामिल किया। मुख्यमंत्री ने हाल ही में 72 लोगों को हटाया, जो विभिन्न विभागों के चेयरमैन थे और उन्हें राज्यमंत्री का दर्ज़ा प्राप्त था।

एसोचैम की रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में बीते एक साल में आर्थिक तरक्की काफी तेज़ी से हुई है। इसके अलावा बिजली और सड़क निर्माण कार्य भी काफी तेज़ी से कराया जा रहा है। अखिलेश सरकार के नेतृत्व पर भले ही सवाल उठते रहे हों, लेकिन इस सरकार पर अभी तक भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा है। यूपी में टेक्नोलॉजी और यूथ प्रमोशन को लेकर भी काफी काम हो रहा है। अखिलेश अब बेहद सजग लग रहे हैं और प्रदेश के विकास के लिए लाई गई विभिन्न योजनाओं को खुद लीड कर रहे हैं।

यूपी में अगले साल चुनाव हैं और इसके चलते प्रदेश के मुख्यमंत्री ने जनता से संवाद भी बढ़ा दिया है। रोज़ाना वह किसी ने किसी योजना का उद्घाटन करते हैं और जनता के बीच बने रहने की कोशिश करते हैं। सोशल मीडिया पर भी सीएम बेहद एक्टिव रहते हैं और पार्टी और सरकार की उपलब्धियों का ज़ोर-शोर से प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। अखिलेश यादव की वजह से पार्टी में लाखों युवा कार्यकर्ता भी जुड़े हैं, जिसका फायदा आने वाले चुनाव में सपा को मिल सकता हैं। पार्टी का थीम सॉन्ग भी "मन से मुलायम" से बदलकर "कहो दिल से, अखिलेश फिर से" हो गया है, जिससे ज़ाहिर होता है कि 2017 का चुनाव मुलायम नहीं, बल्कि अखिलेश के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। अब साफ है कि कहीं न कहीं अखिलेश ने पार्टी में अपना कद पा लिया है, और प्रदेश के लोगों को मुख्यमंत्री मिल गया है।

लेकिन अखिलेश यादव ने देर कर दी है या सही समय पर उन्होंने कमान संभाली है, इसका जवाब तो जनता उन्हें 2017 के चुनाव में ही देगी।

गाजियाबाद मेयर उपचुनाव जाति, धर्म और संप्रदाय के चक्रव्यूह में

गाजियाबाद में मेयर पद के उपचुनाव में प्रत्याशियों की दावेदारी और रणनीति बहुत ही रोचक तरीके से लोगों के सामने आ रही है। प्रत्याशियों की वोटों के लिए अपील और मनलुभावन नारे लोगों के लिए गाॅसिप या फिर मनोरंजन का विषय भी बन रहे हैं। इन प्रत्याशियों के कार्यकर्ता आम जनता को अपने उम्मीदवार को वोट देने के लिए जिन तर्कों का सहारा ले रहे हैं वह उनके राजनीतिक ज्ञान का बखूबी परिचय दे रही है। लोग कहते हैं कि इनसे अच्छे तो किसी भी कंपनी के सेल्समेन होते हैं जिन्हें कम से कम कंपनी और प्राॅडक्ट की जानकारी तो होती है। कमबख्त इन कार्यकत्ताओं के तर्काें और ज्ञान को देखकर खीझ ही उत्पन्न होती है।

खैर हम बात कर रहे हैं मेयर पद के प्रत्याशियों की। गाजियाबाद में इस चुनावी घमासान में सपा प्रत्याशी सुधन रावत और बीजेपी प्रत्याशी अशु वर्मा के बीच मानी जा रही है। सुधन रावत पिछले तीन चुनाव मेयर, एमपी और एमएलए के लिए जनता द्वारा नकारे जा चुके हैं यानी कि वे हारे थके अनुभवी उम्मीदवार हैं। उनके चुनावी रणनीतिकार और सलाहकार भी वही दिखाई पड़ रहे हैं। सपा के महानगर अध्यक्ष संजय यादव पहले भी सुधन रावत के चुनाव में अपनी क्षमताओं ओैर योग्यताओं का प्रदर्शन कर चुके हैं। जिन्हें पिछले चुनाव में हार के बाद पद हटा दिया गया था। और धर्मवीर डबास को कमान दी गई थी। लेकिन कुछ समय बाद ही संजय यादव को दोबारा महानगर की जिम्मेदारी सौंप दी गई। जिसके बाद संजय यादव ने अपनी नई टीम का गठन किया। तो इस बार एक बार फिर संजय यादव एण्ड टीम की परीक्षा है। वहीं पिछले चुनाव में हार के बाद सपा पार्टी ने महिला विंग में फेरबदल करते हुए महानगर पद पर पंजाबी चेहरा रितु खन्ना और ब्राहम्ण चेहरा उषा शर्मा को जिले में अध्यक्ष पद पर जिम्मेदारी सौंपी। तो इस बार बहुत से पदाधिकारियों की अग्निपरीक्षा है कि वे क्या कारनामा कर पाएंगे? क्या ये नई टीम सपा का गाजियाबाद में खाता खुलवा पाएगी। या फिर सब कुछ पहले जैसा ही होगा।

इसको लेकर संशय इसलिए बन रहा है क्यों कि कुछ दिन पहले सुधन रावत की रणनीतिक टीम ने गाजियाबाद से वोट की अपील के लिए फेसबुक पर एक वीडियो क्लिप अपलोड की थी। जिसमें सुधन रावत को एक सुपर मेन सरीखा दिखाया गया था। जो गाजियाबाद की प्रमुख समस्याओं का हल सुपरमेन की विलक्षण शक्तियों की तरह हल करता है। परंतु जब केंद्र सरकार की स्मार्ट सिटी परियोजना में पहले 20 शहरों की लिस्ट में गाजियाबाद को शामिल नहीं किया गया तो सुधन रावत की बड़ी किर करी हुई है। लोग कहते हुए देखे गए कि इस प्रत्याशी में दूर दर्शिता का अभाव है। जिससे सपा प्रत्याशी को बेकफुट पर जाना पड़ा होगा। यह सुधन रावत के रणनीतिकारों और राजनीतिक शुभचिंतकों की योग्यता पर प्रश्न चिन्ह लगाता है।

आपको याद होगा कि पिछले चुनावों के दौरान संजय यादव ने गुर्जर और जाट समाज को सुधन रावत के लिए एकजुट करने की असफल कोशिश कर चुके हैं। ऐसे में वे पिछली असफलता से कितना सीख कर सफलता के दरवाजे को खोल पाएंगे।

आइए बात करते हैं बीजेपी के प्रत्याशी अशु वर्मा की जो गुर्जर समाज से आते हैं। अशु के लिए जीत का सफर बड़ा कांटों भरा है। वे गुर्जर समाज के विरोध और अंतर्कलह का सामना कर रहे हैं। बीजेपी ने गुर्जर समाज की एकजुटता को अपने खेमे में दिखाने के लिए पोस्टरबाजी का सहारा लिया।जिसमें उन्होंने पूर्व विधायक रूप चैधरी का फोटो छापा। जिसके विरोध स्वरूप रूप चैधरी ने अपनी फेसबुक वाॅल पर अपना बयान अपलोड किया। जिसके बाद बीजेपी को गाजियाबाद में शर्मदिगी का सामना करना पड़ा।

इस चुनाव में बसपा का उम्मीदवार ना होने से और किसी को समर्थन ना देने की घोषणा के बाद बीजेपी की नजर दलित वोटरों पर हैं। जिन्हें साधने में वे किसी भी तरह की कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। दलितों के साथ कुछ जनसभाएं इस रणनीति का खुलासा भी कर रही हैं।लेकिन दिलचस्प यह है कि दलित वोटर इस चुनाव को किस तरह ले रहा है। क्या वह इसे महज औपचारिकता और चुनावी उत्सव के बतौर ले रहा है। क्या वह इस चुनावी घमासान की धुरी बनकर अपनी महत्ता को साबित करना चाहता है। अब समस्या यह है कि बीजेपी और कांग्रेस में स्थानीय स्तर से लेकर राष्टीय स्तर तक एकभी ऐसा नेता नहीं है जो दलित वोटरों को लामबंद कर सके। यदि ऐसा होता तो हैदराबाद के रोहित वेमूला की आत्महत्या के मामले को बीजेपी संभाल लेती। और ना ही राहुल गांधी को कांग्रेस की तरफ से उन छात्रों के साथ रोहित के लिए भूख हड़ताल पर बैठना पड़ता। जो इस बात को समझने और समझाने के लिए काफी है कि बीजेपी और कांग्रेस दलितों को कैसे साधेगी। दलितों को साधने की कला नीतिश कुमार और राम विलास पासवान में है। जिसका असर बिहार के चुनावों के दौरान देखने के लिए मिलता है।

चलिए अब बात करते हैं कि गाजियाबाद के चुनाव में बछियाओं के तथाकथित ताउओं के बारे में। जो गाय को राजनीतिक खुराक बना रहे हैं। वे इसे हिंदुओं को एकजुट करने का आधार मान कर चल रहे हैं। वे इस बात को जोर शोर से प्रचारित कर रहे हैं कि गाजियाबाद में हिंदू असुरक्षित है। उनकी आस्था का प्रतीक गाय का जीवन खतरे में हैं। जिसमें लगभग 33 करोड़ हिंदू देवी देवता वास करते हैं। जिसको लेकर कुछ दल हाल ही में उभर कर सामने आए हैं। जिसका उदाहरण शहर में लगे पोस्टर और होर्डिंग हैं। यानि की इस बार गाय का भी राजनीतिक कार्ड अहम भूमिका निभा सकता है। इसलिए हिुंदुत्व की बात आते ही बीजेपी और आरएसएस का नाम आता है। जिसकी बहुत सी ब्रांच हैं। इसीलिए शायद सपा प्रत्याशी सुधन रावत ने गौ नंदी टाइप की एक सेवा समीति में संरक्षक वाला बड़ा सा होर्डिंग साहिबाबाद के आराधना आॅटो स्टैण्ड पर लगा हुआ है। जो यह बताने की चेष्टा कर रहा है कि गाय हमारे लिए भी उतनी ही पवित्र और पूजनीय है। जितनी औरों के लिए।

लेकिन ऐसे में सवाल यह उठता है कि ये गाय उस वक्त नजर क्यों नहीं आती जब यह सड़क पर आवारा पशुओं की भांति बेसहारा खड़ी रहती है। जो अपने भोजन को कूड़े के ढेर में, गंदगी में और इधर उधर ढंूडती है। गाय की याद तभी क्यों आती है जब कोई धार्मिक कार्य में उसकी आवश्यकता पड़ती है।
जो फौरी तौर बात समझ में आती है कि गाय भी अब दलित कार्ड, अल्पसंख्यक कार्ड, स्वर्ण कार्ड, सिख कार्ड की तरह राजनीति में एक कार्ड की तरह इस्तेमाल की चीज बनती जा रही है।

गाजियाबाद के इस उप चुनाव में विकास और समस्याओं के मुद्दे गौण हो गए हैं। जातियां, धर्म और संप्रदाय मुख्य हो गए हैं।जिसके आधार पर चुनाव लड़ा जा रहा है। शहरी और ग्रामीण चुनाव में कोई अंतर नजर नहीं आ रहा है। बड़ी हैरानी की बात है कि ये लोग उस शिक्षित युवा वर्ग और समुदाय को कैसे रिझाएंगे जो सिर्फ उम्मीदवार के एजेंडे के आधार पर वोट देता है। उसे पार्टी या समुदाय, जाति और धर्म से कोई सरोकार नहीं है। वो सिर्फ देश के साथ साथ शहर और गांव में विकास चाहता है।