गाजियाबाद में मेयर पद के उपचुनाव में प्रत्याशियों की दावेदारी और रणनीति बहुत ही रोचक तरीके से लोगों के सामने आ रही है। प्रत्याशियों की वोटों के लिए अपील और मनलुभावन नारे लोगों के लिए गाॅसिप या फिर मनोरंजन का विषय भी बन रहे हैं। इन प्रत्याशियों के कार्यकर्ता आम जनता को अपने उम्मीदवार को वोट देने के लिए जिन तर्कों का सहारा ले रहे हैं वह उनके राजनीतिक ज्ञान का बखूबी परिचय दे रही है। लोग कहते हैं कि इनसे अच्छे तो किसी भी कंपनी के सेल्समेन होते हैं जिन्हें कम से कम कंपनी और प्राॅडक्ट की जानकारी तो होती है। कमबख्त इन कार्यकत्ताओं के तर्काें और ज्ञान को देखकर खीझ ही उत्पन्न होती है।
खैर हम बात कर रहे हैं मेयर पद के प्रत्याशियों की। गाजियाबाद में इस चुनावी घमासान में सपा प्रत्याशी सुधन रावत और बीजेपी प्रत्याशी अशु वर्मा के बीच मानी जा रही है। सुधन रावत पिछले तीन चुनाव मेयर, एमपी और एमएलए के लिए जनता द्वारा नकारे जा चुके हैं यानी कि वे हारे थके अनुभवी उम्मीदवार हैं। उनके चुनावी रणनीतिकार और सलाहकार भी वही दिखाई पड़ रहे हैं। सपा के महानगर अध्यक्ष संजय यादव पहले भी सुधन रावत के चुनाव में अपनी क्षमताओं ओैर योग्यताओं का प्रदर्शन कर चुके हैं। जिन्हें पिछले चुनाव में हार के बाद पद हटा दिया गया था। और धर्मवीर डबास को कमान दी गई थी। लेकिन कुछ समय बाद ही संजय यादव को दोबारा महानगर की जिम्मेदारी सौंप दी गई। जिसके बाद संजय यादव ने अपनी नई टीम का गठन किया। तो इस बार एक बार फिर संजय यादव एण्ड टीम की परीक्षा है। वहीं पिछले चुनाव में हार के बाद सपा पार्टी ने महिला विंग में फेरबदल करते हुए महानगर पद पर पंजाबी चेहरा रितु खन्ना और ब्राहम्ण चेहरा उषा शर्मा को जिले में अध्यक्ष पद पर जिम्मेदारी सौंपी। तो इस बार बहुत से पदाधिकारियों की अग्निपरीक्षा है कि वे क्या कारनामा कर पाएंगे? क्या ये नई टीम सपा का गाजियाबाद में खाता खुलवा पाएगी। या फिर सब कुछ पहले जैसा ही होगा।
इसको लेकर संशय इसलिए बन रहा है क्यों कि कुछ दिन पहले सुधन रावत की रणनीतिक टीम ने गाजियाबाद से वोट की अपील के लिए फेसबुक पर एक वीडियो क्लिप अपलोड की थी। जिसमें सुधन रावत को एक सुपर मेन सरीखा दिखाया गया था। जो गाजियाबाद की प्रमुख समस्याओं का हल सुपरमेन की विलक्षण शक्तियों की तरह हल करता है। परंतु जब केंद्र सरकार की स्मार्ट सिटी परियोजना में पहले 20 शहरों की लिस्ट में गाजियाबाद को शामिल नहीं किया गया तो सुधन रावत की बड़ी किर करी हुई है। लोग कहते हुए देखे गए कि इस प्रत्याशी में दूर दर्शिता का अभाव है। जिससे सपा प्रत्याशी को बेकफुट पर जाना पड़ा होगा। यह सुधन रावत के रणनीतिकारों और राजनीतिक शुभचिंतकों की योग्यता पर प्रश्न चिन्ह लगाता है।
आपको याद होगा कि पिछले चुनावों के दौरान संजय यादव ने गुर्जर और जाट समाज को सुधन रावत के लिए एकजुट करने की असफल कोशिश कर चुके हैं। ऐसे में वे पिछली असफलता से कितना सीख कर सफलता के दरवाजे को खोल पाएंगे।
आइए बात करते हैं बीजेपी के प्रत्याशी अशु वर्मा की जो गुर्जर समाज से आते हैं। अशु के लिए जीत का सफर बड़ा कांटों भरा है। वे गुर्जर समाज के विरोध और अंतर्कलह का सामना कर रहे हैं। बीजेपी ने गुर्जर समाज की एकजुटता को अपने खेमे में दिखाने के लिए पोस्टरबाजी का सहारा लिया।जिसमें उन्होंने पूर्व विधायक रूप चैधरी का फोटो छापा। जिसके विरोध स्वरूप रूप चैधरी ने अपनी फेसबुक वाॅल पर अपना बयान अपलोड किया। जिसके बाद बीजेपी को गाजियाबाद में शर्मदिगी का सामना करना पड़ा।
इस चुनाव में बसपा का उम्मीदवार ना होने से और किसी को समर्थन ना देने की घोषणा के बाद बीजेपी की नजर दलित वोटरों पर हैं। जिन्हें साधने में वे किसी भी तरह की कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। दलितों के साथ कुछ जनसभाएं इस रणनीति का खुलासा भी कर रही हैं।लेकिन दिलचस्प यह है कि दलित वोटर इस चुनाव को किस तरह ले रहा है। क्या वह इसे महज औपचारिकता और चुनावी उत्सव के बतौर ले रहा है। क्या वह इस चुनावी घमासान की धुरी बनकर अपनी महत्ता को साबित करना चाहता है। अब समस्या यह है कि बीजेपी और कांग्रेस में स्थानीय स्तर से लेकर राष्टीय स्तर तक एकभी ऐसा नेता नहीं है जो दलित वोटरों को लामबंद कर सके। यदि ऐसा होता तो हैदराबाद के रोहित वेमूला की आत्महत्या के मामले को बीजेपी संभाल लेती। और ना ही राहुल गांधी को कांग्रेस की तरफ से उन छात्रों के साथ रोहित के लिए भूख हड़ताल पर बैठना पड़ता। जो इस बात को समझने और समझाने के लिए काफी है कि बीजेपी और कांग्रेस दलितों को कैसे साधेगी। दलितों को साधने की कला नीतिश कुमार और राम विलास पासवान में है। जिसका असर बिहार के चुनावों के दौरान देखने के लिए मिलता है।
चलिए अब बात करते हैं कि गाजियाबाद के चुनाव में बछियाओं के तथाकथित ताउओं के बारे में। जो गाय को राजनीतिक खुराक बना रहे हैं। वे इसे हिंदुओं को एकजुट करने का आधार मान कर चल रहे हैं। वे इस बात को जोर शोर से प्रचारित कर रहे हैं कि गाजियाबाद में हिंदू असुरक्षित है। उनकी आस्था का प्रतीक गाय का जीवन खतरे में हैं। जिसमें लगभग 33 करोड़ हिंदू देवी देवता वास करते हैं। जिसको लेकर कुछ दल हाल ही में उभर कर सामने आए हैं। जिसका उदाहरण शहर में लगे पोस्टर और होर्डिंग हैं। यानि की इस बार गाय का भी राजनीतिक कार्ड अहम भूमिका निभा सकता है। इसलिए हिुंदुत्व की बात आते ही बीजेपी और आरएसएस का नाम आता है। जिसकी बहुत सी ब्रांच हैं। इसीलिए शायद सपा प्रत्याशी सुधन रावत ने गौ नंदी टाइप की एक सेवा समीति में संरक्षक वाला बड़ा सा होर्डिंग साहिबाबाद के आराधना आॅटो स्टैण्ड पर लगा हुआ है। जो यह बताने की चेष्टा कर रहा है कि गाय हमारे लिए भी उतनी ही पवित्र और पूजनीय है। जितनी औरों के लिए।
लेकिन ऐसे में सवाल यह उठता है कि ये गाय उस वक्त नजर क्यों नहीं आती जब यह सड़क पर आवारा पशुओं की भांति बेसहारा खड़ी रहती है। जो अपने भोजन को कूड़े के ढेर में, गंदगी में और इधर उधर ढंूडती है। गाय की याद तभी क्यों आती है जब कोई धार्मिक कार्य में उसकी आवश्यकता पड़ती है।
जो फौरी तौर बात समझ में आती है कि गाय भी अब दलित कार्ड, अल्पसंख्यक कार्ड, स्वर्ण कार्ड, सिख कार्ड की तरह राजनीति में एक कार्ड की तरह इस्तेमाल की चीज बनती जा रही है।
गाजियाबाद के इस उप चुनाव में विकास और समस्याओं के मुद्दे गौण हो गए हैं। जातियां, धर्म और संप्रदाय मुख्य हो गए हैं।जिसके आधार पर चुनाव लड़ा जा रहा है। शहरी और ग्रामीण चुनाव में कोई अंतर नजर नहीं आ रहा है। बड़ी हैरानी की बात है कि ये लोग उस शिक्षित युवा वर्ग और समुदाय को कैसे रिझाएंगे जो सिर्फ उम्मीदवार के एजेंडे के आधार पर वोट देता है। उसे पार्टी या समुदाय, जाति और धर्म से कोई सरोकार नहीं है। वो सिर्फ देश के साथ साथ शहर और गांव में विकास चाहता है।
खैर हम बात कर रहे हैं मेयर पद के प्रत्याशियों की। गाजियाबाद में इस चुनावी घमासान में सपा प्रत्याशी सुधन रावत और बीजेपी प्रत्याशी अशु वर्मा के बीच मानी जा रही है। सुधन रावत पिछले तीन चुनाव मेयर, एमपी और एमएलए के लिए जनता द्वारा नकारे जा चुके हैं यानी कि वे हारे थके अनुभवी उम्मीदवार हैं। उनके चुनावी रणनीतिकार और सलाहकार भी वही दिखाई पड़ रहे हैं। सपा के महानगर अध्यक्ष संजय यादव पहले भी सुधन रावत के चुनाव में अपनी क्षमताओं ओैर योग्यताओं का प्रदर्शन कर चुके हैं। जिन्हें पिछले चुनाव में हार के बाद पद हटा दिया गया था। और धर्मवीर डबास को कमान दी गई थी। लेकिन कुछ समय बाद ही संजय यादव को दोबारा महानगर की जिम्मेदारी सौंप दी गई। जिसके बाद संजय यादव ने अपनी नई टीम का गठन किया। तो इस बार एक बार फिर संजय यादव एण्ड टीम की परीक्षा है। वहीं पिछले चुनाव में हार के बाद सपा पार्टी ने महिला विंग में फेरबदल करते हुए महानगर पद पर पंजाबी चेहरा रितु खन्ना और ब्राहम्ण चेहरा उषा शर्मा को जिले में अध्यक्ष पद पर जिम्मेदारी सौंपी। तो इस बार बहुत से पदाधिकारियों की अग्निपरीक्षा है कि वे क्या कारनामा कर पाएंगे? क्या ये नई टीम सपा का गाजियाबाद में खाता खुलवा पाएगी। या फिर सब कुछ पहले जैसा ही होगा।
इसको लेकर संशय इसलिए बन रहा है क्यों कि कुछ दिन पहले सुधन रावत की रणनीतिक टीम ने गाजियाबाद से वोट की अपील के लिए फेसबुक पर एक वीडियो क्लिप अपलोड की थी। जिसमें सुधन रावत को एक सुपर मेन सरीखा दिखाया गया था। जो गाजियाबाद की प्रमुख समस्याओं का हल सुपरमेन की विलक्षण शक्तियों की तरह हल करता है। परंतु जब केंद्र सरकार की स्मार्ट सिटी परियोजना में पहले 20 शहरों की लिस्ट में गाजियाबाद को शामिल नहीं किया गया तो सुधन रावत की बड़ी किर करी हुई है। लोग कहते हुए देखे गए कि इस प्रत्याशी में दूर दर्शिता का अभाव है। जिससे सपा प्रत्याशी को बेकफुट पर जाना पड़ा होगा। यह सुधन रावत के रणनीतिकारों और राजनीतिक शुभचिंतकों की योग्यता पर प्रश्न चिन्ह लगाता है।
आपको याद होगा कि पिछले चुनावों के दौरान संजय यादव ने गुर्जर और जाट समाज को सुधन रावत के लिए एकजुट करने की असफल कोशिश कर चुके हैं। ऐसे में वे पिछली असफलता से कितना सीख कर सफलता के दरवाजे को खोल पाएंगे।
आइए बात करते हैं बीजेपी के प्रत्याशी अशु वर्मा की जो गुर्जर समाज से आते हैं। अशु के लिए जीत का सफर बड़ा कांटों भरा है। वे गुर्जर समाज के विरोध और अंतर्कलह का सामना कर रहे हैं। बीजेपी ने गुर्जर समाज की एकजुटता को अपने खेमे में दिखाने के लिए पोस्टरबाजी का सहारा लिया।जिसमें उन्होंने पूर्व विधायक रूप चैधरी का फोटो छापा। जिसके विरोध स्वरूप रूप चैधरी ने अपनी फेसबुक वाॅल पर अपना बयान अपलोड किया। जिसके बाद बीजेपी को गाजियाबाद में शर्मदिगी का सामना करना पड़ा।
इस चुनाव में बसपा का उम्मीदवार ना होने से और किसी को समर्थन ना देने की घोषणा के बाद बीजेपी की नजर दलित वोटरों पर हैं। जिन्हें साधने में वे किसी भी तरह की कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। दलितों के साथ कुछ जनसभाएं इस रणनीति का खुलासा भी कर रही हैं।लेकिन दिलचस्प यह है कि दलित वोटर इस चुनाव को किस तरह ले रहा है। क्या वह इसे महज औपचारिकता और चुनावी उत्सव के बतौर ले रहा है। क्या वह इस चुनावी घमासान की धुरी बनकर अपनी महत्ता को साबित करना चाहता है। अब समस्या यह है कि बीजेपी और कांग्रेस में स्थानीय स्तर से लेकर राष्टीय स्तर तक एकभी ऐसा नेता नहीं है जो दलित वोटरों को लामबंद कर सके। यदि ऐसा होता तो हैदराबाद के रोहित वेमूला की आत्महत्या के मामले को बीजेपी संभाल लेती। और ना ही राहुल गांधी को कांग्रेस की तरफ से उन छात्रों के साथ रोहित के लिए भूख हड़ताल पर बैठना पड़ता। जो इस बात को समझने और समझाने के लिए काफी है कि बीजेपी और कांग्रेस दलितों को कैसे साधेगी। दलितों को साधने की कला नीतिश कुमार और राम विलास पासवान में है। जिसका असर बिहार के चुनावों के दौरान देखने के लिए मिलता है।
चलिए अब बात करते हैं कि गाजियाबाद के चुनाव में बछियाओं के तथाकथित ताउओं के बारे में। जो गाय को राजनीतिक खुराक बना रहे हैं। वे इसे हिंदुओं को एकजुट करने का आधार मान कर चल रहे हैं। वे इस बात को जोर शोर से प्रचारित कर रहे हैं कि गाजियाबाद में हिंदू असुरक्षित है। उनकी आस्था का प्रतीक गाय का जीवन खतरे में हैं। जिसमें लगभग 33 करोड़ हिंदू देवी देवता वास करते हैं। जिसको लेकर कुछ दल हाल ही में उभर कर सामने आए हैं। जिसका उदाहरण शहर में लगे पोस्टर और होर्डिंग हैं। यानि की इस बार गाय का भी राजनीतिक कार्ड अहम भूमिका निभा सकता है। इसलिए हिुंदुत्व की बात आते ही बीजेपी और आरएसएस का नाम आता है। जिसकी बहुत सी ब्रांच हैं। इसीलिए शायद सपा प्रत्याशी सुधन रावत ने गौ नंदी टाइप की एक सेवा समीति में संरक्षक वाला बड़ा सा होर्डिंग साहिबाबाद के आराधना आॅटो स्टैण्ड पर लगा हुआ है। जो यह बताने की चेष्टा कर रहा है कि गाय हमारे लिए भी उतनी ही पवित्र और पूजनीय है। जितनी औरों के लिए।
लेकिन ऐसे में सवाल यह उठता है कि ये गाय उस वक्त नजर क्यों नहीं आती जब यह सड़क पर आवारा पशुओं की भांति बेसहारा खड़ी रहती है। जो अपने भोजन को कूड़े के ढेर में, गंदगी में और इधर उधर ढंूडती है। गाय की याद तभी क्यों आती है जब कोई धार्मिक कार्य में उसकी आवश्यकता पड़ती है।
जो फौरी तौर बात समझ में आती है कि गाय भी अब दलित कार्ड, अल्पसंख्यक कार्ड, स्वर्ण कार्ड, सिख कार्ड की तरह राजनीति में एक कार्ड की तरह इस्तेमाल की चीज बनती जा रही है।
गाजियाबाद के इस उप चुनाव में विकास और समस्याओं के मुद्दे गौण हो गए हैं। जातियां, धर्म और संप्रदाय मुख्य हो गए हैं।जिसके आधार पर चुनाव लड़ा जा रहा है। शहरी और ग्रामीण चुनाव में कोई अंतर नजर नहीं आ रहा है। बड़ी हैरानी की बात है कि ये लोग उस शिक्षित युवा वर्ग और समुदाय को कैसे रिझाएंगे जो सिर्फ उम्मीदवार के एजेंडे के आधार पर वोट देता है। उसे पार्टी या समुदाय, जाति और धर्म से कोई सरोकार नहीं है। वो सिर्फ देश के साथ साथ शहर और गांव में विकास चाहता है।

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