Monday, February 1, 2016

आखिरकार अखिलेश यादव बन ही गए मुख्यमंत्री...

हाल ही में मुलायम सिंह ने अखिलेश के तीन करीबी नेताओं को पार्टी विरोधी गतिविधियों की वजह से निकाल दिया था। अपने चहेते सुनील सिंह साजन, आनंद भदौरिया और सुबोध यादव के निकाले जाने से नाराज़ अखिलेश ने पिछले साल 26 दिसंबर से शुरू हुए सैफई महोत्सव का बहिष्कार कर इसे प्रतिष्ठा का मुद्दा बना लिया था। यह पहला मौका था, जब अखिलेश ने खुलकर पार्टी और अपने पिता के खिलाफ बगावत की। पांच दिन बाद जब अखिलेश सैफई गए तो कयास लगाया गया कि उनके करीबियों की वापसी पर पिता-पुत्र में समझौता हो गया है और वैसा ही हुआ। मुलायम सिंह को सुनील सिंह, सुबोध यादव और आनंद भदौरिया को पार्टी में वापस लेना पड़ा। इससे पहले जब प्रदेश में मंत्रिमंडल में फेरबदल हुआ तो मुलायम के कई करीबी मंत्रियों के पर कतरे गए या उन्हें हटा दिया गया और उनकी जगह सीएम ने अपने लोगों को शामिल किया। मुख्यमंत्री ने हाल ही में 72 लोगों को हटाया, जो विभिन्न विभागों के चेयरमैन थे और उन्हें राज्यमंत्री का दर्ज़ा प्राप्त था।

एसोचैम की रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में बीते एक साल में आर्थिक तरक्की काफी तेज़ी से हुई है। इसके अलावा बिजली और सड़क निर्माण कार्य भी काफी तेज़ी से कराया जा रहा है। अखिलेश सरकार के नेतृत्व पर भले ही सवाल उठते रहे हों, लेकिन इस सरकार पर अभी तक भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा है। यूपी में टेक्नोलॉजी और यूथ प्रमोशन को लेकर भी काफी काम हो रहा है। अखिलेश अब बेहद सजग लग रहे हैं और प्रदेश के विकास के लिए लाई गई विभिन्न योजनाओं को खुद लीड कर रहे हैं।

यूपी में अगले साल चुनाव हैं और इसके चलते प्रदेश के मुख्यमंत्री ने जनता से संवाद भी बढ़ा दिया है। रोज़ाना वह किसी ने किसी योजना का उद्घाटन करते हैं और जनता के बीच बने रहने की कोशिश करते हैं। सोशल मीडिया पर भी सीएम बेहद एक्टिव रहते हैं और पार्टी और सरकार की उपलब्धियों का ज़ोर-शोर से प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। अखिलेश यादव की वजह से पार्टी में लाखों युवा कार्यकर्ता भी जुड़े हैं, जिसका फायदा आने वाले चुनाव में सपा को मिल सकता हैं। पार्टी का थीम सॉन्ग भी "मन से मुलायम" से बदलकर "कहो दिल से, अखिलेश फिर से" हो गया है, जिससे ज़ाहिर होता है कि 2017 का चुनाव मुलायम नहीं, बल्कि अखिलेश के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। अब साफ है कि कहीं न कहीं अखिलेश ने पार्टी में अपना कद पा लिया है, और प्रदेश के लोगों को मुख्यमंत्री मिल गया है।

लेकिन अखिलेश यादव ने देर कर दी है या सही समय पर उन्होंने कमान संभाली है, इसका जवाब तो जनता उन्हें 2017 के चुनाव में ही देगी।

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