Wednesday, February 1, 2017

यूपी चुनाव 2017-- जानें बुलंदशहर की सभी विधानसभा सीटों के बारे में

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रमुख जिला बुलंदशहर, दिल्ली से बेहद करीब है लेकिन विकास से कोसों दूर है। कहीं बिजली, कहीं पानी तो कहीं सड़कों की समस्या से जूझ रहे इस जिले ने देश-प्रदेश को कई बड़े नेता और यूपी को एक सीएम भी दिया है।

वर्तमान में बुलंदशहर जिले में 7 विधानसभा सीटें हैं। बुलंदशहर, अनूपशहर, सिकंदराबाद, डिबाई, खुर्जा, स्याना, और शिकारपुर। बुलंदशहर, अनूपशहर सीट पर बसपा का कब्जा है जबकि डिबाई और शिकारपुर सीटों पर सपा का। स्याना और खुर्जा सीट कांग्रेस के पास है, सिकंदराबाद सीट पर भाजपा काबिज है।
बुलंदशहर और अनूपशहर दोनों ही सीटों पर पिछले दो चुनावों में बसपा के प्रत्याशियों को ही जीत मिली है। दोनों ही विधायकों- हाजी अलीम (बुलंदशहर) और गजेंद्र सिंह (अनूपशहर) को करीब 10 साल से क्षेत्र का विकास करने का मौका मिला हुआ है। 2017 के चुनावों में देखना ये होगा कि जनता की कसौटी पर ये 10 साल कितने खरे उतरे।

डिबाई के विधायक गुड्डू पंडित उर्फ श्रीभगवान शर्मा पहले बसपा के टिकट पर चुनाव जीते थे। 2012 में फिर चुनावों का मौका आया तो वह सपा में शामिल हो गए और एक बार फिर विधायक चुने गए। अब 2016 में उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया है। पिछले दो बार से वह विधायक चुने जा रहे हैं और इस बार देखना ये होगा कि क्या जनता उनके काम पर मुहर लगाती है?

शिकारपुर के विधायक हैं मुकेश शर्मा। मुकेश, गुड्डू पंडित के भाई हैं और सपा के टिकट पर चुनाव जीते थे। स्याना सीट से विधायक हैं दिलनवाज खान। दिलनवाज, वेस्ट यूपी के दिग्गज कांग्रेसी नेता इम्तियाज के बेटे हैं। इम्तियाज की मृत्यु के बाद उन्हें टिकट मिला और वह विधायक चुने गए।

पॉटरी उद्योग के लिए प्रसिद्ध खुर्जा से विधायक हैं कांग्रेस के बंसी पहाडिया। पहले ये सीट बसपा के पास थी लेकिन 2012 में उसके हाथ से फिसल कर कांग्रेस की झोली में आ गिरी। अब 2017 में खुर्जा की जनता किस पार्टी और नेता को विधायक चुनेगी यह देखने वाली बात होगी।
सिकंदराबाद सीट से विधायक हैं भाजपा की बिमला सोलंकी। सिकंदराबाद सीट गुर्जर, सैनी और ठाकुर बाहिल्य सीट मानी जाती है और जातीय समीकरण यहां काफी हावी रहते हैं।
2017 के लिए बसपा ने तो अपने पत्ते खोल दिए थे। सपा ने भी एक सीट पर प्रत्याशी घोषित कर दिया है लेकिन बाकी पार्टियों ने अभी पत्ते नहीं खोले हैं।

यूपी चुनाव 2017, जानें हाथरस की सभी विधानसभा सीटों के बारे में



हाथरस विधान सभा
पुरुष मतदाता -2,10,825
महिला मतदाता- 1,70,819
कुल मतदाता- 3,81,649

जिले की हाथरस विधान सभा सुरक्षित है। वर्ष 2012 के चुनाव से पहले ये सुरक्षित थी। लगातार तीन बार रामवीर उपाध्याय यहां से विधायक रहे। इसी सीट से पहली बार जीतने के बाद वह ऊर्जा मंत्री, परिवहन मंत्री रहे। वर्ष 2012 में भी बसपा के गेंदालाल जीते। वर्तमान में बसपा ने गेंदालाल को फिर से प्रत्याशी बनाने से इंकार कर दिया है। बसपा के पुराने सिपाही जिला पंचायत सदस्य बृजमोहन राही को टिकट दिया गया है। भाजपा, कांगे्रस, रालोद से कोई प्रत्याशी घोषित नहीं है। सपा ने यहां से 2012 में प्रत्याशी रहे और तीसरे नंबर पर आए रामनारायन काके को पहले टिकट दी थी। मुलायम परिवार में घमासान के दौरान काके की टिकट काटकर 90 के दशक में लोक सभा चुनाव लड़ चुके मूलचन्द निम को सपा प्रत्याशी बनाया गया है।

हाथरस में 2017 चुनाव के लिए दावेदार-प्रत्याशी 
सपा के घोषित प्रत्याशी-- मूलचन्द निम

भाजपा से प्रमुख दावेदार-- पूर्व विधायक हरीशंकर माहौर, हाथरस पालिका नगर पालिका चेयरमैन प्रतिनिधि-- वासुदेव माहौर, रामवीर सिंह भइयाजी, विनोद चैधरी, संध्या आर्य, नंदिनी देवी।
कांग्रेस से प्रमुख दावेदार-- राजेश राज जीवन, बलवीर सिंह सूर्यवंशी, अनुज संत, योगेश कुमार ओके, राजपाल सिंह पुनियां।
रालोद से प्रमुख दावेदार--पूर्व विधायक रमेश करन, महेन्द्र सिंह धनगर

वर्ष 2012 हाथरस में चुनावी स्थिति
गेंदालाल चैधरी, बसपा, जीते। वोट मिले-59, 161
मुख्य प्रतिद्विंद्वी--राजेश दिवाकर, भाजपा। वोट मिले-50, 488
जीत का अंतर-- 8673 (4.23 प्रतिशत)

सादाबाद विधान सभा
पुरुष मतदाता--1,91,711
महिला मतदाता--1,46,335
कुल मतदाता--3,38,104

हाथरस जिले में हाथरस(सदर), सिकंदराराऊ और सादाबाद कुल तीन विधान सभा सीटें हैं। सिर्फ सादाबाद विधान सभा क्षेत्र से सपा के देवेन्द्र अग्रवाल वैश्य समाज से विधायक हैं। जाट बाहुल्य इस सीट पर सपा की लखनऊ में चल रही कलह का असर जरूर पड़ेगा। पूर्व ऊर्जा मंत्री रामवीर उपाध्याय के बसपा से चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद से भी यह सीट सपा से फिसलती नजर आ रही है। संख्या के लिहाज से वैश्य समाज का वोट इस सीट पर जाट, ब्राह्मण, बघेल के बाद ही आता है।

सादाबाद में 2017 चुनाव के लिए दावेदार-प्रत्याशी
बसपा से प्रत्याशी--पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय।
सपा से प्रमुख दावेदार--वर्तमान विधायक देवेन्द्र अग्रवाल।
भाजपा से प्रमुख दावेदार--चैधरी रामकुमार वर्मा, प्रीति चैधरी, सुभाष चैधरी, कप्तार्न ंसह ठेनुआं, मुन्ना प्रधान, सुनील गौतम, हरमेश गौतम,
कांग्रेस से प्रमुख दावेदार--शरद उपाध्याय नंदा, केशवदेव चतुर्वेदी, सत्यप्रकाश रंगीला, ब्रह्मदेव शर्मा।
रालोद से प्रमुख दावेदार--पूर्व विधायक डॉ. अनिल चैधरी, पूर्व विधायक प्रताप चैधरी, प्रदी कुमार गुड्डू चैधरी, गिरेन्द्र चैधरी,इशांत चैधरी।

वर्ष 2012 में सादाबाद में चुनावी स्थिति 
देवेन्द्र अग्रवाल, सपा,जीते। वोट मिले- 63, 741
मुख्य प्रतिद्विंद्वी- सत्येन्द्र शर्मा, बसपा। वोट मिले- 57554
जीत का अंतर रू 5,187(2.75 प्रतिशत)

सिकंदराराऊ विधान सभा
पुरुष मतदाता-- 1,89,363
महिला मतदाता--1,52,992
कुल मतदाता-3,42,366

ठाकुर बाहुल्य इस सीट पर वर्तमान में विधान सभा की लोक लेखा समिति के सभापति व पूर्व ऊर्जा मंत्री रामवीर उपाध्याय विधायक हैं। वर्ष 2012 के चुनाव में वह पहली बार सिकंदराराऊ से लड़े थे। सपा प्रत्याशी यशपाल सिंह चैहान से उनकी कांटे की टक्कर हुई थी। महज एक हजार वोटों से रामवीर उपाध्याय चुनाव जीत पाए थे। यही कारण रहा कि उन्होंने इस सीट को छोड़ना बेहतर समझा। बसपा ने यहां पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष ओमवती बघेल के पति बनी सिंह बघेल को प्रत्याशी बनाया है। सपा ने वर्ष 2012 में यशपाल को लड़ाया था। इस बार भी उन पर दांव लगाया है। यशपाल पूर्व में भाजपा से विधायक रह चुके हैं। यहां से सपा के पूर्व एमएलसी डॉ. राकेश सिंह राना भी चुनाव लड़ने के लिए पिछले छह सात साल से प्रयास कर रहे हैं।

सिकंदराराऊ में 2017 चुनाव के लिए दावेदार-प्रत्याशी 
सपा से घोषित उम्मीदवार-पूर्व विधायक यशपाल सिंह चैहान।
बसपा से घोषित उम्मीदवार- पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष के पति बर्नी सह बघेल।
भाजपा से प्रमुख दावेदार-ओबीसी मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो.एसपी सिंह बघेल की पत्नी मधु बघेल, पूर्व जिलाध्यक्ष वीएस राना, कुसुमा देवी मदनावत, बृजेश चैहान, डॉ. राजीव सिंह, नरेन्द्र सिंह चैहान।
कांग्रेस से प्रमुख दावेदार-- ब्रह्मदेव शर्मा, जगतवर्ती पाठक, आरके राजू, सत्यप्रकाश रंगीला, वीना गुप्ता।
रालोद से प्रमुख दावेदार-- सिकंदराराऊ में वोट बैंक नहीं होने के चलते प्रत्याशी की चर्चा नहीं।

वर्ष 2012 में सिकंदराराऊ में चुनावी स्थिति
रामवीर उपाध्याय, बसपा, जीते। वोट मिले- 94, 471
मुख्य प्रतिद्विंद्वी-- यशपाल सिंह चैहान, सपा। वोट मिले- 93, 408
जीत का अंतर 1063 वोट,(0.52 प्रतिशत)

अब भी मुख्यधारा से दूर हैं यूपी के दलित


अजय शर्मा
छुआछूत का पारंपरिक दोष आज भी हमारे समाज में कायम है। अब भी इसकी जडे गहरी हैं। अलग-अलग श्रेणियों व पायदानों के बहाने समाज के लाखों लोगों को उन कामों में रमने को मजबूर किया गया, जिन्हें आमतौर पर कलंक माना जाता है। उनका सामाजिक बहिष्कार किया गया। आजादी के बाद भारत छुआछूत को खत्म करने को आगे बढ़ा था। सांविधानिक प्रावधान के तहत 1950 में अनुसूचित जातियों की सूची तैयार की गई, ताकि उन लोगों तक विकास व सरकारी नीतियों की रोशनी पहुंचाई जा सके। सुधारवादी काम किए गए, केंद्र व राज्य विधानमंडलों, सिविल सेवा और शैक्षणिक संस्थानों में उन्हें आरक्षण दिया गया।


मगर, सच यही है कि दलित आज भी दूसरे तमाम समुदायों की तुलना में ज्यादा गरीब हैं। आज भी 36 फीसदी ग्रामीण दलित गरीबी रेखा से नीचे हैं। असंगठित श्रम में भी उनकी भागीदारी काफी ज्यादा है। 41 फीसदी दलित पुरुष और करीब 20 फीसदी दलित महिलाएं असंगठित कामगार हैं, जबकि गैर-अनुसूचित जाति, जनजाति पुरुषों में यह आंकड़ा 19 फीसदी व महिलाओं में महज आठ फीसदी है। बमुश्किल 13 फीसदी दलित पुरुष ही ऐसे रोजगार में हैं, जहां से उन्हें नियमित तनख्वाह मिलती है।

ऐसे में, हमारी सरकार को दलित सशक्तीकरण को बढ़ावा देना चाहिए, और इसके लिए सामाजिक व्यवहार और संस्थाओं को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। जरूरत शिक्षा पर भी ध्यान देने की है। 11वीं पंचवर्षीय योजना के अनुसार, दलित बच्चों में ड्रॉप-आउट (पढ़ाई बीच में छोड़ देना) काफी ज्यादा है। आंकडे बताते हैं कि 74 फीसदी दलित लड़के और 71 फीसदी दलित लड़कियां प्राथमिक व मध्य विद्यालयों की पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते हैं। साल 1931 में प्राथमिक स्कूलों में दलित बच्चों के दाखिले की दर सिर्फ चार फीसदी थी। दलित बच्चों की प्रतिभा को आज भी हतोत्साहित किया जा रहा है।
मध्य उत्तर प्रदेश के एक सुदूर गांव में हुआ एक दिलचस्प प्रयोग बताता है कि जिन दलित छात्रों ने पहेलियों को सुलझाने में पहले बेहतर प्रदर्शन किया था, वे तब बुरी तरह विफल रहे, जब उनकी जाति का पहले खुलासा कर दिया गया।
गरीबों और दलितों के प्रति भेदभाव दूर हो, इसके लिए वंचित घरों के बच्चों को बेशक मुफ्त में किताबें या विश्वविद्यालयों में मुफ्त होस्टल की सुविधा दी जा रही है, मगर इन प्रयासों से गरीबी और भेदभाव के खत्म होने में लंबा वक्त लग सकता है। जरूरत है ऐसे छात्रों को बुनियादी सुविधाएं, मसलन बिस्तर, टेबल-कुरसी आदि दिए जाएं। इससे शिक्षा अधिक समावेशी होगी। इसके अलावा, स्कूलों में बच्चों को कीडे मारने की दवा मुफ्त खिलानी चाहिए, ताकि उनकी सेहत दुरुस्त रहे। इससे कक्षा से उनके अनुपस्थित रहने की दर कम होगी और दलित बच्चों के नामांकन की दर बढेगी।

दलित उद्यमिता भी एक बड़ा मुद्दा है। आज भी दलित उद्योगपति काफी कम हैं, क्योंकि ज्यादातर दलित पारंपरिक पेशों में ही लगे हुए हैं। वैसे, इन उद्यमियों को भी भेदभाव रहित सामाजिक प्रतिष्ठा हासिल नहीं है। देश का मानव विकास सर्वे कहता है कि महज 12 फीसदी दलित परिवारों की पहुंच मुख्यधारा से जुड़े दो-तीन उद्यमों तक है, जबकि उच्च वर्गों में यह आंकड़ा 26 फीसदी है। भेदभाव, भूमिहीन होने का इतिहास, सामाजिक दबाव और नगण्य भागीदारी जैसी चीजें दलित उद्यमिता की राह की बाधाएं हैं।

इस स्थिति में गांव और राज्य के स्तर पर सुधार की दरकार है। हमें महाराष्ट्र से सीखना चाहिए। वहां अनुसूचित जाति-जनजाति के कारोबारियों के लिए महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम के अधीन क्षेत्रों में 10 फीसदी जमीन आरक्षित कर दी गई है। यानी पूंजी की समस्या तभी दूर हो सकती है, जब दलित उद्यमिता को ध्यान में रखते हुए अधिक से अधिक ‘सोशल इंपैक्ट फंड’ के रास्ते खोले जाएं। हमें उद्यमिता केंद्रों के विस्तार के बारे में भी सोचना चाहिए, जिसमें पूंजी को बढ़ावा देने और इंफ्रास्ट्रक्चर पर खासा जोर हो। एक समाधान पारंपरिक शिल्प उद्योग से जुड़ी सहकारी समितियों और संस्थाओं का विकास भी हो सकता है। उर्मूल मरुस्थली बुनकर विकास समिति इसका उल्लेखनीय उदाहरण है। इससे मेघवाल समुदाय के 120 दलित बुनकर परिवार जुड़े हैं। आज इन दलितों का न सिर्फ रहन-सहन बेहतर है, बल्कि यहां से अब पलायन भी रुक चुकी है। इतना ही नहीं, स्थानीय रोजगार के तमाम अवसर मानो पुनर्जीवित हो गए हैं।

दलितों को आर्थिक मदद की दरकार है। सच यही है कि कारोबारी क्षेत्र में दलितों की उपस्थिति बढ़ नहीं रही। साल 1990 में इस क्षेत्र में दलितों की उपस्थिति 9.9 फीसदी थी, जो साल 2005 में कम होते हुए 9.8 फीसदी हो गई। अनुसूचित जातिध् जनजाति उद्यमियों को प्रोत्साहित करने का एक तरीका यह है कि हम इस तबके के संघर्ष कर रहे उद्यमियों की आर्थिक मदद करें और लघु व मध्यम उद्योगों को मजबूत करके उनके जरिये दलितों की उद्यमिता को निखारें। इस लिहाज से स्टैंड अप इंडिया अभियान में छोटे व मध्यम आकार के उद्योगों पर खास तवज्जो देना दलितों के लिए फायदेमंद होगा। वैसे यहां तेलंगाना से सीखा जा सकता है। तेलंगाना ने जिला औद्योगिक केंद्रों के जरिये दलित महिला उद्यमियों पर खासा ध्यान देना शुरू किया है। कर्नाटक सरकार ने भी दलित दुग्घ उत्पादकों के लिए यह नीति बनाई है कि उन्हें महज 25,000 में एक जोड़ी गाय दी जाए, यानी 75,000 रुपये की सब्सिडी। यह एक अच्छी शुरुआत है।

कृषि-क्षेत्र में भी दलितों की सुविधाओं का ख्याल रखा जाना चाहिए। भूमि का एक समान व पारदर्शी वितरण असामान्य सामाजिक ढांचे को दुरुस्त करता है। भूमि सुधार से मिला-जुला नतीजा निकला है। स्थिति यह है कि आज भी जहां ‘कागजों’ पर जमीन का वितरण है, वहां दलितों को उनका हक नहीं मिल सका है। ग्रामसभा स्तर पर सामाजिक ऑडिट के जरिये ही इसे ठीक किया जा सकता है। वैसे, इसमें राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की निगरानी में गठित विशेषज्ञ कमेटी की भी दरकार होगी, जो इस काम पर निगाह रखे। हमें न सिर्फ भूमि सुधार की जरूरत को समझना होगा, बल्कि कृषि में दलितों को बराबर का न्याय भी देना होगा।

आंध्र प्रदेश की राज्य सरकार 1969 से एक योजना चला रही है, जिसके तहत सरकारी बंजर जमीन का बंटवारा भूमिहीनों में, खासतौर पर दलितों में किया जाता है। भूदान कार्यक्रम के तहत 1,13,972 एकड़ से अधिक जमीन 43,000 जरूरतमंदों को बांटे गए थे। केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जिन-जिन दलितों को जमीन मिली है, उन्हें सामूहिक सिंचाई की सुविधा भी मिले। साथ ही, बेहतर बीज, भंडारण की सुविधा भी उन्हें मिलनी चाहिए। भूदान का अर्थ सिर्फ भूमि का दान नहीं होना चाहिए। आज हमारा समाज ऊंची-ऊंची उड़ानें भर रहा है। महज एक पीढ़ी के भीतर वह सामंतवाद से उत्तर-आधुनिकतावाद की ओर बढ़ता हुआ दिख रहा है। ऐसे में, यह नई और आधुनिक पीढ़ी की जिम्मेदारी है कि वह समाज में समानता लाए। दलितों की आजीविका से जुड़े इन तमाम मुद्दों पर आवाज बुलंद करने की दरकार है।



जानिए क्या है समाजवादी पार्टी
समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश की प्रमुख पार्टी है। वर्तमान में अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा की यहां सरकार है। सपा की स्थापना मुलायम सिंह यादव ने

4अक्टूबर 1992 को की। मुलायम उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और देश के पूर्व रक्षा मंत्री रह चुके हैं। समाजवादी पार्टी वैसे तो यूपी में काफी सफल पार्टी है लेकिन देश के अन्य राज्यों में भी चुनाव में कूद चुकी है। 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में सपा को 224 सीटें मिली थीं।
मुलायम सिंह के नेतृत्व में सपा ने 1993और 2003 में यूपी में सरकार बनाई थी।15वीं लोकसभा चुनाव के दौरान भी सपा देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभर कर सामने आई थी। इसके बाद2012 में अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा ने चुनाव लड़ा और सरकार बनाई।
चुनाव चिह्नः साइकिल

पार्टी के प्रमुख चेहरेः
संस्थापकः मुलायम सिंह यादव
मुख्यमंत्रीः अखिलेश यादव
आजम खां (रामपुर विधायक)
रामगोपाल यादव (राज्यसभा सांसद)
शिवपाल सिंह यादव (उप्र सपा अध्यक्ष)
धर्मेंद्र यादव (बदायू से सांसद)

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चुनावी मुददा 

विकास के साथ नोटबंदी भी यूपी में होगा चुनावी मुद्दा- सीएम अखिलेश
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा है कि विकास के साथ-साथ नोटबन्दी भी यूपी विधानसभा चुनाव में मुद्दा होगा। पहले जो लोग इसे सही बता रहे थे उन्हें भी इसके नुकसान का एहसास होने लगा है और वे कहने लगे हैं कि इससे बड़ा नुकसान हो रहा है।
सीएम शनिवार को अपने सरकारी आवास पर शहीदों के साथ-साथ अपने पैसे के लिए एटीएम की लाइन में दम तोड़ने वाले लोगों के परिजनों को सहायता राशि के चेक बांट रहे थे।

कैशलेस का सपना अच्छे दिनों जैसा
 अखिलेश ने कहा कि सारे अर्थशास्त्री भी इसे देश की अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदायक बता रहे हैं। हर कोई चाहता है कि काला धन और भ्रष्टाचार खत्म हो लेकिन किसी भी नई चीज को लागू करने में समय लगता है। उन्होंने कहा कि यह कैशलेस वाला सपना भी अच्छे दिन वाले सपने जैसा ही है। यह अब सभी जानने लगे हैं।



पूर्व मुख्यमंत्री मायावती को भी जानिए

 सुप्रीमो मायावती 4 बार यूपी की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। वे पहली दलित महिला हैं जो भारत के किसी राज्य की मुख्यमंत्री बनीं। उनके समर्थक उन्हें बहनजी कहते हैं तो उनके विरोधी भी उनकी तारीफें करते हैं। यूपी की राजनीति के मैदान में उनकी पहचान माहिर खिलाड़ी की है।

प्रभुदयाल और रामरती के घर 15 जनवरी 1956 को मायावती का जन्म हुआ था। दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए और एलएलबी करने के बाद वह सिविल सर्विसेस की तैयारी कर रही थीं और अध्यापन का काम भी कर रही थीं। इसी दौरान माया का परिचय काँशी राम से हुआ जिन्होंने उन्हें राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया।

काँशी राम और मायावती ने बसपा को शुरु किया और आगे बढ़ाया। कई लोगों ने माया का विरोध भी किया लेकिन वे आगे बढ़ती रहीं। बसपा की तरक्की होती रही औप माया अपने बयानों और तेवरों के कारण सुर्खियों में आती रहीं। वे आज देश की सबसे काबिल और कद्दावर नेताओं में मानी जाती हैं।
उन पर कई आरोप भी लगते रहे लेकिन माया ने जैसे झुकना सीखा ही नहीं। वे लगातार ताकतवर होती रही हैं। बसपा आज राष्ट्रीय पार्टी बन गई है और मायावती दलितों की बड़ी नेता।

यूपी की कमान सबसे ज्यादा बार मायावती को


 प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री सर नवाब मुहम्मद अहमद सईद खां ( नवाब छतारी ) थे। इनका कार्यकाल 3-04-1937 से 16-07-1937 तक था। तब से लेकर अब तक उत्तर प्रदेश में कुल 31 बार मुख्यमंत्री चुने जा चुके हैं। इसमें खास बात है कि मायावती चार बार प्रदेश की मुख्यमंत्री चुनी गई हैं।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री एवं उनके कार्यकाल
क्रम संख्या मुख्यमंत्री प्रीमियर कार्यकाल
1.सर नवाब मुहम्मद अहमद सईद खाँ ( नवाब छतारी )- 03-04-1937 से 16-07-1937 तक (प्रीमियर )
2.पंडित गोविंद वल्लभ पंत- 17-07-1937 से 02-11-1939 तक (प्रीमियर )
01-04-1946 से 25-01-1950 तक (प्रीमियर )
26-01-1950 से 20-05-1952 तक
20-05-1952 से 27-12-1954 तक

3.डा० सम्पूर्णानंद- 28-12-1954 से 09-04-1957 तक
10-04-1957 से 06-12-1960 तक
4.चंद्रभानु गुप्त- 07-12-1960 से 14-03-1962 तक
14-03-1962 से 01-10-1963 तक
5.सुचेता कृपलानी- 02-10-1963 से 13-03-1967 तक
6.चंद्रभानु गुप्त- 14-03-1967 से 02-04-1967 तक
7.चैधरी चरण सिंह 03-04-1967 से 25-02-1968 तक
8.चंद्रभानु गुप्त 26-02-1969 से 17-02-1970 तक
9.चैधरी चरण सिंह 18-02-1970 से 01-10-1970 तक
10.त्रिभुवन नारायण सिंह 18-10-1970 से 03-04-1971 तक
11.कमलापति त्रिपाठी- 04-04-1971 से 12-06-1973 तक
12.हेमवती नन्दन बहुगुणा- 08-11-1973 से 04-03-1974 तक
05-03-1974 से 29-11-1975 तक
13. नारायण दत्त तिवारी-21-01-1976 से 30-04-1977 तक
14.राम नरेश यादव 23-06-1977 से 27-02-1979 तक
15.बनारसी दास 28-02-1979 से 17-02-1980 तक
16.विश्वनाथ प्रताप सिंह 09-06-1980 से 18-07-1982 तक
17.श्रीपति मिश्र- 19-07-1982 से 02-08-1984 तक
18.नारायण दत्त तिवारी -03-08-1984 से 10-03-1985 तक
11-03-1985 से 24-09-1985 तक
19.वीर बहादुर सिंह 24-09-1985 से 24-06-1988 तक
20.नारायण दत्त तिवारी 25-06-1988 से 05-12-1989 तक
21.मुलायम सिंह यादव 05-12-1989 से 24-06-1991 तक
22.कल्याण सिंह 24-06-1991 से 06-12-1992 तक
23.मुलायम सिंह यादव 04-12-1993 से 03-06-1995 तक
24. मायावती 03-06-1995 से 18-10-1995 तक
21-03-1997 से 20-09-1997 तक
25.कल्याण सिंह 21-09-1997 से 12-11-1999 तक
26.राम प्रकाश 12-11-1999 से 28-10-2000 तक
27. राजनाथ सिंह 28-10-2000 से 08-03-2002 तक
28.मायावती 03-05-2002 से 29-08-2003 तक
29.मुलायम सिंह यादव 29-08-2003 से 13-05-2007 तक
30.मायावती 13-05-2007 से 15-03-2012 तक
31.अखिलेश यादव 15-03-2012 से अब तक

समाजवादी पार्टी अध्यक्ष नेता जी


सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री व केंद्र सरकार में एक बार रक्षा मंत्री रह चुके हैं। उनका जन्म 22 नवम्बर 1939 को इटावा जिले के सैफई गांव में मूर्ति देवी व सुधर सिंह के घर हुआ। राजनीति में आने से पहले मुलायम सिंह आगरा विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर (एम०ए०) एव जैन इन्टर कालेज करहल (मैनपुरी) से बीटी करने के बाद कुछ दिनों तक इन्टर कालेज में अध्यापन कार्य भी कर चुके हैं।

अपने राजनीतिक गुरु नत्थूसिंह को मैनपुरी में आयोजित एक कुश्ती प्रतियोगिता में प्रभावित करने के पश्चात मुलायम सिंह ने नत्थूसिंह के परम्परागत विधान सभा क्षेत्र जसवन्त नगर से ही अपना राजनीतिक सफर आरम्भ किया था। मुलायम सिंह 1967 में पहली बार विधान सभा के सदस्य चुने गए और मंत्री बने। 1992 में उन्होंने समाजवादी पार्टी बनाई। वे तीन बार क्रमशः 5 दिसम्बर 1989 से 24 जनवरी 1991 तक, 5 दिसम्बर 1993 से 3 जून 1996 तक और 29 अगस्त 2003 से 11 मई 2007 तक उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री रहे। इसके अतिरिक्त वे केंद्र सरकार में रक्षा मंत्री भी रह चुके हैं।
पांच भाइयों में तीसरे नंबर के मुलायम सिंह के दो विवाह हुए हैं। पहली शादी मालती देवी के साथ हुई। मालती देवी के साथ विवाह में रहते हुए ही मुलायम ने साधना गुप्ता से भी विवाह किया। अखिलेश यादव मालती देवी के बेटे हैं। जबकि प्रतीक यादव दूसरी पत्नी साधना के बेटे हैं।

अपने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को जानिए



अखिलेश यादव वर्तमान में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। इससे पूर्व वे लगातार तीन बार सांसद भी रह चुके हैं। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश ने 2012 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में अपनी पार्टी का नेतृत्व किया। उनकी पार्टी को राज्य में स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद, 15 मार्च 2012 को उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की।

अखिलेश यादव का जन्म 1 जुलाई 1973 को इटावा जिले के सैफई गाँव में हुआ था। राजस्थान मिलिट्री स्कूल धौलपुर के बाद स्नातक की उपाधि मैसूर के एसजे कालेज ऑफ इंजीनियरिंग से ली। इसके बाद सिडनी विश्वविद्यालय से पर्यावरण अभियान्त्रिकी में स्नातकोत्तर किया। अखिलेश तीन बच्चों के पिता हैं। डिम्पल यादव उनकी पत्नी हैं, जो कि कन्नौज से निर्विरोध सांसद चुनी गई हैं।

अखिलेश ने मई 2009 के लोकसभा उप-चुनाव में फिरोजाबाद सीट से अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी एसपीएस बघेल को हराया।

इसके अतिरिक्त वे कन्नौज से भी जीते। बाद में उन्होंने फिरोजाबाद सीट से त्यागपत्र दे दिया और कन्नौज सीट अपने पास रखी। मार्च 2012 के विधान सभा चुनाव में 224 सीटें जीतकर मात्र 38 वर्ष की आयु में ही वे उत्तर प्रदेश के 33वें मुख्यमंत्री बन गये।

सोलह बार हो चुका है उत्तर प्रदेश विधान सभा का गठन

रोचक जानकारी
जरूर जाने


विधान सभा का कार्यकाल कुल 5 साल का होता है अगर वह इसके पूर्व विघटित न हो गई हो। उत्तर प्रदेश में पहली बार विधान सभा का गठन 8 मार्च, 1952 को हुआ था। तब से इसका गठन सोलह बार हो चुका है। वर्तमान सोलहवीं विधान सभा का गठन 8 मार्च, 2012 को किया गया था।
पहली विधानसभा का विघठन 31 मार्च 1957 को किया गया था। इसके बाद दूसरी विधान सभा का गठन 1 अप्रैल 1957 को किया गया था और यह छह मार्च 1962 विघटन हुई। चैथी विधान सभा का गठन 10 मार्च 1967 में किया और 15 अप्रैल 1968 को इसका विघटन हो गया। यहां देखिए उत्तर प्रदेश विधान सभा के गठन और विघटन की तारीख

विधान सभा गठन प्रथम उपवेशन कार्य काल पूरा होने की तारीख (संविधान के अनुच्छेद 172) विघटन
प्रथम विधान सभा 08-03-1952 20-05-1952 19-05-1957 31-03-1957
दूसरी विधान सभा 01-04-1957 10-04-1957 09-04-1962 06-03-1962
तीसरी विधान सभा 07-03-1962 26-03-1962 25-03-1967 09-03-1967
चैथी विधान सभा 10-03-1967 17-03-1967 16-03-1972 15-04-1968
पांचवीं विधान सभा 26-02-1969 17-03-1969 16-03-1974 04-03-1974
छठी विधान सभा 04-03-1974 18-03-1974 17-03-1979 30-04-1977
सातवीं विधान सभा 23-06-1977 12-07-1977 11-07-1982 17-02-1980
आठवीं विधान सभा 09-06-1980 03-07-1980 02-07-1985 10-03-1985
नवीं विधान सभा 10-03-1985 15-03-1985 14-03-1990 29-11-1989
दसवीं विधान सभा 02-12-1989 09-01-1990 08-01-1995 04-04-1991
ग्यारहवीं विधान सभा 22-06-1991 30-07-1991 29-07-1996 06-12-1992
बारहवीं विधान सभा 04-12-1993 15-12-1993 14-12-1998 28-10-1995
तेरहवीं विधान सभा 17-10-1996 27-03-1997 26-03-2002 07-03-2002
चैदहवीं विधान सभा 26-02-2002 14-05-2002 14-05-2007 13-05-2007
पंद्रहवीं विधान सभा 13-05-2007 18-05-2007 20-05-2012 09-03-2012
सोलहवीं विधान सभा 08-03-2012 28-05-2012


गाजियाबाद विधान सभा सीट

यूपी के चुनाव में गाजियाबाद जिले की चारों सीटें बहुत महत्वपूर्ण हंै। सत्ताधारी पार्टी यहां पर अपना खाता खोलने के लिए तरस रही है। गाजियाबाद को बीजेपी का गढ़ माना जाता है। यहां से किसी अन्य पार्टी के लिए जीत का परचम लहराना इतना आसान नहीं होता है। फिलहाल हम आपको पिछले विधान सभा चुनाव 2012 में जीते प्रत्याशियों की सूची ब्यौरे समेत दे रहे हैं।  



गाजियाबाद विधान सभा सीट 
वर्ष -  2012
विधायक -  सुरेश बंसल
लिंग -  पुरुष
उम्र -  69
पार्टी नाम -  बसपा
जिला -  गाजियाबाद
उपविजेता -  अतुल गर्ग
उपविजेता पार्टी -  भाजपा
अंतर -  12121
अंतर प्रतिशत -  6.69ः
मेल वोटर -  104771
फीमेल वोटर -  76126
कुल वोटर -  181322


साहिबाबाद विधान सभा सीट 
वर्ष -  2012
विधायक -  अमरपाल
लिंग -  पुरुष
उम्र -  44
पार्टी नाम -  बसपा
जिला -  गाजियाबाद
उपविजेता -  सुनील कुमार शर्मा
उपविजेता पार्टी -  भाजपा
अंतर -  24348
अंतर प्रतिशत -  7.30ः
मेल वोटर -  196321
फीमेल वोटर -  136993
कुल वोटर -  333657


मोदी नगर विधान सभा सीट
वर्ष -  2012
विधायक -  सुदेश शर्मा
लिंग -  पुरुष
उम्र -  47
पार्टी नाम -  रालोद
जिला -  गाजियाबाद
उपविजेता -  राजपाल सिंह
उपविजेता पार्टी -  बसपा
अंतर -  13949
अंतर प्रतिशत -  7.87ः
मेल वोटर -  102279
फीमेल वोटर -  74512
कुल वोटर -  177263

मुरादनगर
वर्ष -  2012
विधायक -  वहाब
लिंग -  पुरुष
उम्र -  51
पार्टी नाम -  बसपा
जिला -  गाजियाबाद
उपविजेता -  राजपाल त्यागी
उपविजेता पार्टी -  सपा
अंतर -  3622
अंतर प्रतिशत -  1.68ः
मेल वोटर -  122603
फीमेल वोटर -  92660
कुल वोटर -  216063

अति पिछड़ों की एकजुटता ही बहुमत दिलाएगी- स्वामी प्रसाद मौर्य

पूर्व मंत्री व भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा है कि अति पिछड़े भाजपा के पक्ष में पूरी तरह एकजुट हो चुके हैं। अति पिछड़ों की एकजुटता ही भाजपा को प्रदेश में बहुमत दिलाएगी।
उन्होंने कहा है कि भाजपा वास्तव में लोकतांत्रिक दल है और इसमें विचारों की राजनीति होती है। बोले-सपा-बसपा ने हमेशा पिछड़ों को छला है, उन्हें अबकी सबक सिखाने का मौका है। भाजपा ने उन्हें हर दो विधानसभा पर एक पिछड़ा वर्ग सम्मेलन करने की जिम्मेदारी दी थी। यह सम्मेलन 6 नवम्बर से शुरू और 24 दिसंबर को खत्म हुए। मंगलवार को लखनऊ में उन्होंने पिछड़ा वर्ग सम्मेलनों की बाबत बातचीत की।सपा-बसपा ने पिछड़ों को हमेशा छला श्री मौर्य ने कहा कि समाजवादी पार्टी के

प्रमुख मुलायम सिंह ने पिछड़ों की दुहाई देकर उनके वोट तो हासिल कर लिए, सरकार बनाने के बाद उन्हें दरकिनार कर दिया। इसी तरह बसपा की प्रमुख मायावती ने लोकलुभावन नारों के साथ पिछड़ों के वोट तो लिए, लेकिन बाद में दगा कर गईं और थैलीशाहों के हाथों खेलती रह गईं।
भाजपा के मुख्यमंत्री चाहे मध्य प्रदेश में हो या छत्तीसगढ़ में सभी पिछड़ी जातियों के हैं। भाजपा में अब पहले जैसा माहौल नहीं रहा। मेरे पार्टी छोड़ने के बाद बसपा तीसरे पायदान परस्वामी प्रसाद ने बसपा प्रमुख पर आरोप लगाया कि उन्होंने डा. भीमराव अम्बेडकर के मिशन को चकनाचूर किया। इसके साथ कांशाराम भी पिछड़ों के सम्मान, स्वाभिमान और हिस्सेदारी लेकर ताउम्र संघर्ष करते रहे लेकिन मायावती ने कांशीराम के विचारों को भी त्याग दिया। उन्होंने कहा कि उनके पार्टी छोड़ने के बाद बसपा तीसरे पायदान पर आ गई है।

भाजपा में काफी सहज महसूस कर रहा हूंश्री मौर्य ने कहा कि बसपा की तुलना में भाजपा में काफी सहज महसूस कर रहे हैं। बोले-यहां पार्टी में लोकतंत्र है। कोई दवाब नहीं है। पार्टी जहां कार्यक्रम लगाती है, वहां जाता हूं। भाजपा मुख्यालय पर जाने के बाबत उन्होंने कहा कि बिना जरूरत कुर्ता लहराने की न उनकी आदत है और न चाहत।

बसपा प्रमुख के सभी खातों की जांच हों
स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि बसपा के नई दिल्ली स्थित बैंक खाते में 104 करोड़ रुपये पाए जाना उनकी अकूत संपत्ति का एक फीसदी भी नहीं है। उन्होंने आयकर और ईडी से बसपा प्रमुख और उनके संबंधियों के सभी खातों की जांच की मांग की है।

मुलायम की बड़ी हसरत थी प्रधानमंत्री बनने की


दिल्ली। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव को राजनीति के अखाड़े का पहलवान माना जाता है। यूपी की राजनीति बिना उनके जिक्र के पूरी नहीं होती। उनके दिल में प्रधानमंत्री बनने की इच्छा है यह बात उन्होंने कभी छुपाई नहीं, बल्कि 2012 में यूपी की गद्दी पर अखिलेश की ताजपोशी इसी इच्छा का परिणाम मानी जाती है।

1996 में एक वक्त ऐसा आया था जब वह पीएम बनने से चूक गए थे। कहा जाता है कि लालू यादव और शरद यादव के विरोध के कारण ऐसा हुआ। माना जाता है कि 1999 में भी ऐसा मौका आया था लेकिन फिर से मुलायम को निराशा का सामना करना पड़ा। मुलायम सिंह यादव ने लालू प्रसाद को लेकर अपनी नाराजगी छुपाई भी नहीं है। एक बार मुलायम ने बयान दिया था कि जिन चार लोगों ने मुझे प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया, वो हैं लालू प्रसाद यादव, शरद यादव, चंद्र बाबू नायडू और वीपी सिंह।


जानिए क्या था गेस्ट हाउस मामला



1993 में सपा और बसपा ने मिल कर सरकार बनाई थी। 1995 आते-आते दोनों पार्टियों के बीच संबंध खराब हो गए। बसपा के कई विधायक सपा के करीबी हो गए थे। इस खींचतान से खफा मायावती लखनऊ गेस्ट हाउस में समर्थन वापसी की तैयारियां कर रही थीं कि तभी सपा समर्थकों ने गेस्ट हाउस पर हमला कर दिया।

बताया जाता है कि इस दौरान मायावती के साथ काफी अभद्रता की गई थी। मायावती ने कुछ अन्य विधायकों के साथ खुद को कमरे में बंद कर लिया था जबकि भीड़ ने दरवाजा तोड़ने की भी कोशिश की थी। कहा जाता है कि अगर भाजपा के कुछ कार्यकर्ता और पुलिस समय पर नहीं पहुंचते तो कोई बड़ी घटना भी हो सकती थी। 2 जून 1995 को घटी इस घटना ने सपा और बसपा के बीच जो खाई बनाई वह शायद ही कभी भर पाएगी।

यूपी दंगल, दांव पेंच का खेल शुरू


अजय शर्मा
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की राजनीति अत्यंत रोचक मोड़ पर आ पहुंची है। भारतीय जनता पार्टी ने इलाहाबाद में हुई राष्ट्रीय परिषद की बैठक के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बड़ी रैली करके अपने मिशन 2017 का आगाज कर दिया था। उसके बाद तो सभी राजनीतिक दल अपने अभियान में जुट गए। समाजवादी पार्टी की सरकार ने टेलीविजन और अखबारों में विज्ञापन अभियान चला रखा है, तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पूरे प्रदेश में रैलियां करने में जुट गए हैं। कांग्रेस ने भी लखनऊ और वाराणसी में रोड शो के बाद खाट सभाओं का आयोजन किया। तो वहीं बहुजन समाज पार्टी ने सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय रैलियों के जरिये अपनी ताल ठोकी।

बसपा ने शुरुआत में रैलियों के लिए जिन स्थानों को चुना, वे उसकी राजनीति के स्ट्रॉन्ग होल्ड के रूप में जाने जाते हैं। इनमें से दो जगह इलाहाबाद और सहारनपुर में नरेंद्र मोदी ने दो रैलियां की।  इसलिए बसपा ने उनकी रैली से बड़ी रैली करने की योजना बनाई। इलाहाबाद में तो वह इसमें कामयाब भी रही। सहारनपुर की रैली के लिए भी उन्होंने इसी रणनीति पर काम किया। दरअसल, नरेंद्र मोदी की रैली से बड़ी रैली करके और फिर उसका प्रचार करके बसपा ने एक साथ कई संदेश दिए। एक तो उसने यह बताने की कोशिश की, कि मुख्य मुकाबला भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच है, जिसमें बसपा अपनी मुख्य प्रतिद्वंद्वी से बीस है।
दूसरे, वह यह भी दिखाना चाहती थी कि समाजवादी पार्टी इस लड़ाई में कहीं नहीं है। इसके साथ ही बसपा यह दावा भी कर रही है कि वह अन्य दलों की तरह दूसरे क्षेत्रों व राज्यों के लोग इकट्ठे नहीं करेगी। बसपा का इरादा आस-पास के जिलों से अपने मतदाताओं और समर्थकों को इकट्ठा करना है। शुरू से ही बसपा का यह तरीका रहा हैै कि वह अपने मतदाताओं को एकत्र करती है और फिर उन्हें अपने काडर में तब्दील करती है। कई स्तरों पर उसके वोटर, सपोर्टर और काडर में बहुत ज्यादा फर्क नहीं रह जाता।

बसपा की रणनीति में सामाजिक समीकरण हमेशा से मुख्य भूमिका निभाते रहे हैं। दलित हमेशा से उसका मुख्य आधार रहे हैं, लेकिन इसके साथ ही अन्य जातियों और समुदायों को जोड़कर वह आगे बढ़ने की कोशिश करती है। सर्वजन का नारा भी इसीलिए दिया जा रहा है। इन रैलियों में दूसरी जातियों को लाने के अलावा मुस्लिम समुदाय को भी बड़ी संख्या में जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

दलित-मुस्लिम गठजोड़ उसकी रणनीति का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस बार बसपा का भविष्य बहुत हद तक इस गठजोड़ में उसकी कामयाबी से ही तय होगा। इसी वजह से रैलियों के लिए ऐसे स्थानों को चुना गया है, जहां दलित और मुस्लिम आबादी बड़ी संख्या में है। पार्टी ने इसके प्रयास दो-तीन साल पहले ही शुरू कर दिए थे। जिस तरह पिछली बार बसपा ने अपनी सोशल इंजीनियरिंग में ब्राह्मण-दलित गठजोड़ की केमेस्ट्री आधारतल तक फैलाने के लिए भाईचारा समितियां बनाकर शुरुआत की थी, उसी तरह 2017 के विधानसभा चुनाव के लिहाज से दलित-मुस्लिम गठजोड़ को मजबूत करने और उसकी चेतना आधार तल पर फैलाने के लिए उसने स्थानीय व क्षेत्रीय स्तर पर दलित-मुस्लिम नेताओं की कोर टीम बनाने का काम काफी पहले से शुरू कर दिया था। बसपा के कार्यकर्ता काफी समय से मुस्लिम बस्तियों में जाकर लोगों में यह धारणा बनाने की कोशिश कर रहे हैं कि सपा और भाजपा आपस में मिले हुए हैं।

खासकर मुजफ्फरनगर दंगों के बाद उस क्षेत्र में इस तरह के प्रचार का काम बड़े पैमाने पर किया गया। साथ ही मायावती के सत्ता में आने पर दंगे नहीं होंगे, ऐसे आश्वासन भी दिए जा रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि बसपा अल्पसंख्यक समुदाय के गरीबों को आरक्षण देने के लिए लड़ेगी। कई स्तरों पर बसपा पूरे मुस्लिम समुदाय के वोट पाने के लिए सक्रिय दिखाई देती है, तो कई स्तरों पर वह मुस्लिम समुदाय के पिछड़े समूहों, पसमांदा मुसलमानों आदि पर खास ध्यान दे रही है। अंसारी, गद्दी, ततवा, फकीर, हलालखोर, आदि सामाजिक समूहों की बस्तियों में बसपा की गतिविधियां बढ़ती जा रही हैं। इसके अलावा गरीब मुसलमान शब्द का भी वह काफी इस्तेमाल कर रही है। इन जातियों से अलग दूसरे गरीब वर्गों तक पहुंचने के लिए भी यह उसे जरूरी लगता है। मुसलमान मतदाताओं के साथ कुछ पिछड़ी जातियों को जोड़ने की बसपा की यह रणनीति नई नहीं है, बल्कि पार्टी संस्थापक कांशीराम के जमाने से ही चली आ रही है।

दलित-मुस्लिम गठजोड़ को मजबूत करने के लिए मायावती की दूसरी रणनीति है-  विधानसभा चुनाव 2017 में मुसलमानों को अधिक टिकट देना। बसपा ने इस चुनाव में 100 से ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे हंै। खासकर उन क्षेत्रों में, जहां मुसलमानों की आबादी काफी है। पार्टी का मानना है कि इस रणनीति से इन निर्वाचन क्षेत्रों में दलित व मुस्लिम गठजोड़ तो मजबूत होगा ही, इसके असर से अन्य क्षेत्रों में भी मुस्लिम मतदाता बसपा की ओर आएंगे।

मायावती अपने दलित आधार मतों से मुस्लिम मतों को स्टेपनी वोट के रूप में जोड़ने की रणनीति पर तो काम कर ही रही हैं, साथ ही सर्वजन के नारे को फैलाकर अन्य समुदायों, जैसे अति पिछड़ों, सवर्ण ब्राह्मणों और ठाकुर मतों को भी स्टेपनी के रूप में जोड़ने की रणनीति पर चल रही हैं। बसपा का आधार मत तो लगातार उसके पक्ष में संगठित रहा है। लेकिन उसकी जीत की कुंजी इस बात में है कि वह मुस्लिम, अति पिछड़ों और बाकी जातियों के मतों को स्टेपनी मत के रूप में अपने आधार मत से कितना जोड़ पाती है।

Wednesday, January 11, 2017

मायावती हर जिले में जनसभा करेंगी



विधानसभा चुनाव के लिए 401 सीटों पर सबसे पहले प्रत्याशी घोषित कर प्रतिद्वंद्वी दलों पर बढ़त बना चुकी बसपा प्रचार की रणनीति तय करने में लगी हैं। पार्टी अपनी मुखिया मायावती की चुनावी सभाओं को अंतिम रूप दे रही है।

अब तक मिल रहे संकेतों के मुताबिक बसपा अध्यक्ष पश्चिमी उत्तर प्रदेश से चुनाव प्रचार शुरू करेंगी। हर बार की तरह मायावती प्रत्याशियों के पक्ष में जिलों में एक-एक सभा करेंगी। अलबत्ता कम विधानसभा सीटों वाले छोटे जिलों की उससे लगे बड़े जिले में संयुक्त सभा कर सकती हैं। करीब पांच दर्जन चुनावी सभा करने की संभावना है।

बसपा सोनभद्र की दो विधानसभा सीटों को छोड़ कर बाकी सभी सीटों पर प्रत्याशी घोषित कर चुकी है। प्रत्याशियों की सूची जारी करने के बाद पार्टी आगे की रणनीति को धार देने में लग गई है। बसपा अध्यक्ष मायावती अपनी पार्टी की एकमात्र स्टार प्रचारक हैं। किसी भी चुनाव में उनकी सभा पार्टी प्रत्याशी के लिए मायने रखती है। यही कारण है कि बसपा अध्यक्ष की प्रत्याशियों और पार्टी पदाधिकारियों के साथ बीते दो दिन लगातार चली बैठक में प्रत्याशियों के पक्ष में होने वाली पार्टी मुखिया की सभाओं पर भी चर्चा हुई।

इस बार मायावती मेरठ या मुजफ्फरनगर से चुनाव प्रचार शुरू कर सकती हैं। कारण, अगस्त-सितंबर में मायावती ने प्रदेश में जो चार मंडलीय रैलियां की थी, उनमें आगरा और सहारनपुर शामिल था। सुरक्षा और अन्य कारणों से चुनावी सभा का मंच आदि की व्यवस्था का जिम्मा प्रदेश कार्यालय पर होगा। सब लखनऊ से होगा। बसपा अध्यक्ष के अलावा पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चन्द्र मिश्र, विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष नसीमुद्दीन सिद्दीकी, प्रदेश अध्यक्ष राम अचल राजभर समेत दूसरे नेता भी चुनावी सभाएं करेंगे।

अजित सिंह बोले, भाजपा को हराने के लिए कुछ भी करने को तैयार हूं

राष्ट्रीय लोक दल के मुखिया चौधरी अजित सिंह ने रविवार को बस्ती में कहा कि भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए वे कुछ भी करने को तैयार हैं। अक्सर सांप्रदायिक दंगे कराकर सत्ता में आने वाली भाजपा को इस बार किसी भी सूरत में प्रदेश में आने से रोकना है। 2019 में दोबारा केन्द्र पर शासन करने का उसका सपना चकनाचूर करना है।

राजा ऐश्वर्यराज सिंह द्वारा बस्ती में आयोजित किसान अधिकार रैली में अजित सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गलत बयानबाजी करते हैं। प्रधानमंत्री ने सहारनपुर में गन्ना किसानों का पूरा कर्जा माफ कर दिए जाने की बात कही थी जबकि हकीकत यह है कि आज भी किसान हजारों करोड़ रुपए के कर्ज में डूबे हैं। दो साल में ढाई करोड़ युवाओं की जगह महज 1.35 लाख युवाओं को ही रोजगार मिला है।

उन्होंने किसानों का आह्वान किया कि वह पूरा कर्जा माफ करने और प्रदेश-देश में अपनी सरकार बनाने के लिए रालोद को जिताएं। भाजपा को हराने में पूरी ताकत से जुट जाएं। सपा और कांग्रेस से गठबंधन की बात को वह नकार गए।

Tuesday, January 10, 2017

प्रत्याशियों के चयन के लिए अधिकृत किए गए भाजपा प्रदेश अध्यक्ष

भारतीय जनता पार्टी की मंगलवार को हुई चुनाव समिति की बैठक में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य को सभी 403 विधानसभा सीटों पर प्रत्याशियों के चयन के लिए अधिकृत कर दिया गया। बैठक में विधानसभा की हर सीट को लेकर विस्तार से चर्चा हुई।

संसदीय की बोर्ड की बैठक 14 या 15 जनवरी कोपार्टी सूत्रों के अनुसार भाजपा के बड़े नेताओं ने तीन सर्वे रिपोर्टों के आधार पर और कई चरणों में चली आपसी बातचीत में प्रत्याशी तय कर लिए हैं।

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष को प्रत्याशियों के नामों को केंद्रीय संसदीय बोर्ड के सामने ले जाने के लिए अधिकृत किया गया है। केन्द्रीय संसदीय बोर्ड की बैठक भी मकर संक्रान्ति के मौके पर 14 या 15 जनवरी को होगी। बैठक में प्रत्याशियों के नामों पर आखिरी मुहर लगेगी। इसके बाद नाम घोषित किए जाएंगे।अपना दल को आठ और भासपा को चार सीटेंसूत्रों के अनुसार चुनाव समिति की बैठक में अपना दल की अनुप्रिया पटेल की पार्टी के लिए उसकी संसदीय सीटों के आधार पर सीटें देने का मानक तय किया है। अपना दल के पास दो संसदीय सीटें हैं। इस आधार पर उसे आठ सीटें दिया जाना तय माना जा रहा है।

इसके अलावा ओम प्रकाश राजभर की भारतीय समाज पार्टी को चार के आसपास सीटें दी जा सकती हैं।मोदी व अमित की होंगी धुआंधार रैलियांबैठक में चुनाव के दौरान चलने अभियानों और चुनाव प्रचार के तरीकों पर भी विचार हुआ। तय किया गया कि प्रत्याशियों की घोषणा के साथ ही पार्टी के स्टार प्रचारक पीएम नरेन्द्र मोदी व अमित शाह की धुआंधार जनसभाएं लगाई जाएंगी।

बैठक में भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व प्रदेश प्रभारी ओम प्रकाश माथुर, पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य, राष्ट्रीय सहसंगठन मंत्री शिव प्रकाश, केन्द्रीय मंत्री कलराज मिश्र, प्रदेश महामंत्री संगठन सुनील बंसल समेत कई नेता शामिल हुए।

राजनीतिक दलों के दफ्तरों पर राज्य सम्पत्ति विभाग रखेगा नजर

आदर्श आचार संहिता का पालन कराने के लिए अब राजनीतिक दलों के मुख्यालयों पर भी आयोग की नजर है। किसी भी पार्टी मुख्यालय पर ऐसा कोई होर्डिंग, बैनर या पोस्टर जिससे प्रचार हो रहा हो उसे हटाया जा रहा है।

इसके लिए राज्य सम्पत्ति विभाग, पीब्ल्यूडी समेत अन्य विभागों को जिला प्रशासन से निर्देश जारी कर दिए गए हैं। क्योंकि प्रमुख पार्टियों के मुख्यालय इन्हीं विभागों की इमारतों से संचालित हो रहे हैं। वहीं, प्रशासन की राजनीतिक पार्टियों के साथ बैठक के बाद सपा मुख्यालय के सामने स्थित झंडे, बैनर, पोस्टर की दुकानों को ढक दिया गया है।

पार्टी मुख्यालयों पर सिर्फ ऐसे बोर्ड की अनुमति है जिससे यह पता चलता हो कि फलां पार्टी का दफ्तर इस स्थान पर है। इसके अलावा राज्य या केन्द्र सरकार की किसी योजना का प्रचार, किसी नेता का प्रचार करने वाली होर्डिंगों को तत्काल हटाने का निर्देश है। एक दिन पहले ही भाजपा दफ्तर के बाहर लगी एलईडी को ढकवा दिया गया था।

एडीएम प्रशासन अविनाश सिंह ने बताया कि राज्य सम्पत्ति विभाग, पीडब्ल्यूडी, लेसा, आवास विकास, नगर निगम आदि विभागों को निर्देश दिया गया है। इसमें कहा गया है कि सभी विभाग अपने स्वामित्व वाली इमारतों, सड़कों, फुटपाथ और दीवारों से पोस्टर बैनर हटवा दें। लेसा से कहा गया है कि बिजली के खंभों, ट्रांसफार्मरों से प्रचार सामग्री या पोस्टर आदि तत्काल हटा दें।

आयोग के निर्देश पर निकाला गया आदर्श आचार संहिता रथ

मलिहाबाद में आम लोगों व राजनीतिक दलों को जागरूक करने के लिए रविवार को आदर्श आचार संहिता रथ निकाला गया। एसडीएम मलिहाबाद नीता यादव ने इस रथ को हरी झंडी दिखा कर रवाना किया। इस मौके पर तहसीलदार संतोष कुमार राय समेत अन्य तहसील कर्मचारी भी मौजूद थे।

दलित खुद अपनी ताकत बनें : राज बब्बर





प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर ने राज्य के दलितों का आह्वान करते हुए उन्हें लामबंद होने की सीख देते हुए कहा है कि वह अपनी एकता को इतना मजबूत बनाएं ताकि कोई उन्हें अपना साधन न बना सके। बब्बर मंगलवार को लखनऊ में पार्टी की ओर से शुरू की गई दलित स्वाभिमान यात्रा के समापन समारोह को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने प्रदेश के दलितों से कहा कि आपके बहुमत के सहारे लोग जीतते हैं अब आपको खुद जीतने की जरूरत है और खुद जीतने की ताकत बनो ताकि दूसरा कोई आपको मोहरा न बना सके। उन्होंने दलित समुदाय का आह्वान किया कि आज बाबा साहब की नीतियों पर चलने का प्रण लेकर जाए और कांग्रेस पार्टी और उत्तर प्रदेश को बेहतर बनाने का काम करें। सांसद पीएल पुनिया ने कहा कि प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय के इसी परिसर से बीती 4 दिसम्बर को शिक्षा-सुरक्षा-स्वाभिमान यात्रा शुरू हुई थी।

6 दिसम्बर को बाबा साहब के निर्वाण दिवस पर सभी जिलों में निर्वाण दिवस मनाकर बाबा साहब को याद किया गया। यह यात्रा चालीस दिनों में लगभग साढ़े तीन लाख किलोमीटर की रही और हर जिले में 130 यात्राएं हुईं। इस यात्रा को बड़ी कामयाबी मिली। पार्टी के अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय चेयरमैन के. राजू ने कहा कि राहुल गांधी का सपना है कि देश के हर राज्य में दलित नेतृत्व आगे आए और राजनीति, सरकार हर जगह शामिल हो।

उन्होंने कहा कि यूपी में बसपा सिर्फ पैदा इसलिए हुई क्योंकि कांग्रेस पार्टी से दलित दूर हो गई थी। इस अवसर पर सांसद प्रमोद तिवारी, पूर्व केन्द्रीय मंत्री जे.डी. शीलम, विभाग के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ब्रजलाल खाबरी एवं विभाग के प्रान्तीय चेयरमैन भगवती प्रसाद चौधरी, वरिष्ठ उपाध्यक्ष डा. संतोष सिंह, पूर्व मंत्री रामकृष्ण द्विवेदी, सत्यदेव त्रिपाठी, राजबहादुर, ए.आई.सी.सी. अनु जाति विभाग के कोआर्डिनेटर शशांक शुक्ला आदि वरष्ठि नेता मौजूद रहे।