Wednesday, February 1, 2017

सोलह बार हो चुका है उत्तर प्रदेश विधान सभा का गठन

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विधान सभा का कार्यकाल कुल 5 साल का होता है अगर वह इसके पूर्व विघटित न हो गई हो। उत्तर प्रदेश में पहली बार विधान सभा का गठन 8 मार्च, 1952 को हुआ था। तब से इसका गठन सोलह बार हो चुका है। वर्तमान सोलहवीं विधान सभा का गठन 8 मार्च, 2012 को किया गया था।
पहली विधानसभा का विघठन 31 मार्च 1957 को किया गया था। इसके बाद दूसरी विधान सभा का गठन 1 अप्रैल 1957 को किया गया था और यह छह मार्च 1962 विघटन हुई। चैथी विधान सभा का गठन 10 मार्च 1967 में किया और 15 अप्रैल 1968 को इसका विघटन हो गया। यहां देखिए उत्तर प्रदेश विधान सभा के गठन और विघटन की तारीख

विधान सभा गठन प्रथम उपवेशन कार्य काल पूरा होने की तारीख (संविधान के अनुच्छेद 172) विघटन
प्रथम विधान सभा 08-03-1952 20-05-1952 19-05-1957 31-03-1957
दूसरी विधान सभा 01-04-1957 10-04-1957 09-04-1962 06-03-1962
तीसरी विधान सभा 07-03-1962 26-03-1962 25-03-1967 09-03-1967
चैथी विधान सभा 10-03-1967 17-03-1967 16-03-1972 15-04-1968
पांचवीं विधान सभा 26-02-1969 17-03-1969 16-03-1974 04-03-1974
छठी विधान सभा 04-03-1974 18-03-1974 17-03-1979 30-04-1977
सातवीं विधान सभा 23-06-1977 12-07-1977 11-07-1982 17-02-1980
आठवीं विधान सभा 09-06-1980 03-07-1980 02-07-1985 10-03-1985
नवीं विधान सभा 10-03-1985 15-03-1985 14-03-1990 29-11-1989
दसवीं विधान सभा 02-12-1989 09-01-1990 08-01-1995 04-04-1991
ग्यारहवीं विधान सभा 22-06-1991 30-07-1991 29-07-1996 06-12-1992
बारहवीं विधान सभा 04-12-1993 15-12-1993 14-12-1998 28-10-1995
तेरहवीं विधान सभा 17-10-1996 27-03-1997 26-03-2002 07-03-2002
चैदहवीं विधान सभा 26-02-2002 14-05-2002 14-05-2007 13-05-2007
पंद्रहवीं विधान सभा 13-05-2007 18-05-2007 20-05-2012 09-03-2012
सोलहवीं विधान सभा 08-03-2012 28-05-2012


गाजियाबाद विधान सभा सीट

यूपी के चुनाव में गाजियाबाद जिले की चारों सीटें बहुत महत्वपूर्ण हंै। सत्ताधारी पार्टी यहां पर अपना खाता खोलने के लिए तरस रही है। गाजियाबाद को बीजेपी का गढ़ माना जाता है। यहां से किसी अन्य पार्टी के लिए जीत का परचम लहराना इतना आसान नहीं होता है। फिलहाल हम आपको पिछले विधान सभा चुनाव 2012 में जीते प्रत्याशियों की सूची ब्यौरे समेत दे रहे हैं।  



गाजियाबाद विधान सभा सीट 
वर्ष -  2012
विधायक -  सुरेश बंसल
लिंग -  पुरुष
उम्र -  69
पार्टी नाम -  बसपा
जिला -  गाजियाबाद
उपविजेता -  अतुल गर्ग
उपविजेता पार्टी -  भाजपा
अंतर -  12121
अंतर प्रतिशत -  6.69ः
मेल वोटर -  104771
फीमेल वोटर -  76126
कुल वोटर -  181322


साहिबाबाद विधान सभा सीट 
वर्ष -  2012
विधायक -  अमरपाल
लिंग -  पुरुष
उम्र -  44
पार्टी नाम -  बसपा
जिला -  गाजियाबाद
उपविजेता -  सुनील कुमार शर्मा
उपविजेता पार्टी -  भाजपा
अंतर -  24348
अंतर प्रतिशत -  7.30ः
मेल वोटर -  196321
फीमेल वोटर -  136993
कुल वोटर -  333657


मोदी नगर विधान सभा सीट
वर्ष -  2012
विधायक -  सुदेश शर्मा
लिंग -  पुरुष
उम्र -  47
पार्टी नाम -  रालोद
जिला -  गाजियाबाद
उपविजेता -  राजपाल सिंह
उपविजेता पार्टी -  बसपा
अंतर -  13949
अंतर प्रतिशत -  7.87ः
मेल वोटर -  102279
फीमेल वोटर -  74512
कुल वोटर -  177263

मुरादनगर
वर्ष -  2012
विधायक -  वहाब
लिंग -  पुरुष
उम्र -  51
पार्टी नाम -  बसपा
जिला -  गाजियाबाद
उपविजेता -  राजपाल त्यागी
उपविजेता पार्टी -  सपा
अंतर -  3622
अंतर प्रतिशत -  1.68ः
मेल वोटर -  122603
फीमेल वोटर -  92660
कुल वोटर -  216063

अति पिछड़ों की एकजुटता ही बहुमत दिलाएगी- स्वामी प्रसाद मौर्य

पूर्व मंत्री व भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा है कि अति पिछड़े भाजपा के पक्ष में पूरी तरह एकजुट हो चुके हैं। अति पिछड़ों की एकजुटता ही भाजपा को प्रदेश में बहुमत दिलाएगी।
उन्होंने कहा है कि भाजपा वास्तव में लोकतांत्रिक दल है और इसमें विचारों की राजनीति होती है। बोले-सपा-बसपा ने हमेशा पिछड़ों को छला है, उन्हें अबकी सबक सिखाने का मौका है। भाजपा ने उन्हें हर दो विधानसभा पर एक पिछड़ा वर्ग सम्मेलन करने की जिम्मेदारी दी थी। यह सम्मेलन 6 नवम्बर से शुरू और 24 दिसंबर को खत्म हुए। मंगलवार को लखनऊ में उन्होंने पिछड़ा वर्ग सम्मेलनों की बाबत बातचीत की।सपा-बसपा ने पिछड़ों को हमेशा छला श्री मौर्य ने कहा कि समाजवादी पार्टी के

प्रमुख मुलायम सिंह ने पिछड़ों की दुहाई देकर उनके वोट तो हासिल कर लिए, सरकार बनाने के बाद उन्हें दरकिनार कर दिया। इसी तरह बसपा की प्रमुख मायावती ने लोकलुभावन नारों के साथ पिछड़ों के वोट तो लिए, लेकिन बाद में दगा कर गईं और थैलीशाहों के हाथों खेलती रह गईं।
भाजपा के मुख्यमंत्री चाहे मध्य प्रदेश में हो या छत्तीसगढ़ में सभी पिछड़ी जातियों के हैं। भाजपा में अब पहले जैसा माहौल नहीं रहा। मेरे पार्टी छोड़ने के बाद बसपा तीसरे पायदान परस्वामी प्रसाद ने बसपा प्रमुख पर आरोप लगाया कि उन्होंने डा. भीमराव अम्बेडकर के मिशन को चकनाचूर किया। इसके साथ कांशाराम भी पिछड़ों के सम्मान, स्वाभिमान और हिस्सेदारी लेकर ताउम्र संघर्ष करते रहे लेकिन मायावती ने कांशीराम के विचारों को भी त्याग दिया। उन्होंने कहा कि उनके पार्टी छोड़ने के बाद बसपा तीसरे पायदान पर आ गई है।

भाजपा में काफी सहज महसूस कर रहा हूंश्री मौर्य ने कहा कि बसपा की तुलना में भाजपा में काफी सहज महसूस कर रहे हैं। बोले-यहां पार्टी में लोकतंत्र है। कोई दवाब नहीं है। पार्टी जहां कार्यक्रम लगाती है, वहां जाता हूं। भाजपा मुख्यालय पर जाने के बाबत उन्होंने कहा कि बिना जरूरत कुर्ता लहराने की न उनकी आदत है और न चाहत।

बसपा प्रमुख के सभी खातों की जांच हों
स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि बसपा के नई दिल्ली स्थित बैंक खाते में 104 करोड़ रुपये पाए जाना उनकी अकूत संपत्ति का एक फीसदी भी नहीं है। उन्होंने आयकर और ईडी से बसपा प्रमुख और उनके संबंधियों के सभी खातों की जांच की मांग की है।

मुलायम की बड़ी हसरत थी प्रधानमंत्री बनने की


दिल्ली। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव को राजनीति के अखाड़े का पहलवान माना जाता है। यूपी की राजनीति बिना उनके जिक्र के पूरी नहीं होती। उनके दिल में प्रधानमंत्री बनने की इच्छा है यह बात उन्होंने कभी छुपाई नहीं, बल्कि 2012 में यूपी की गद्दी पर अखिलेश की ताजपोशी इसी इच्छा का परिणाम मानी जाती है।

1996 में एक वक्त ऐसा आया था जब वह पीएम बनने से चूक गए थे। कहा जाता है कि लालू यादव और शरद यादव के विरोध के कारण ऐसा हुआ। माना जाता है कि 1999 में भी ऐसा मौका आया था लेकिन फिर से मुलायम को निराशा का सामना करना पड़ा। मुलायम सिंह यादव ने लालू प्रसाद को लेकर अपनी नाराजगी छुपाई भी नहीं है। एक बार मुलायम ने बयान दिया था कि जिन चार लोगों ने मुझे प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया, वो हैं लालू प्रसाद यादव, शरद यादव, चंद्र बाबू नायडू और वीपी सिंह।


जानिए क्या था गेस्ट हाउस मामला



1993 में सपा और बसपा ने मिल कर सरकार बनाई थी। 1995 आते-आते दोनों पार्टियों के बीच संबंध खराब हो गए। बसपा के कई विधायक सपा के करीबी हो गए थे। इस खींचतान से खफा मायावती लखनऊ गेस्ट हाउस में समर्थन वापसी की तैयारियां कर रही थीं कि तभी सपा समर्थकों ने गेस्ट हाउस पर हमला कर दिया।

बताया जाता है कि इस दौरान मायावती के साथ काफी अभद्रता की गई थी। मायावती ने कुछ अन्य विधायकों के साथ खुद को कमरे में बंद कर लिया था जबकि भीड़ ने दरवाजा तोड़ने की भी कोशिश की थी। कहा जाता है कि अगर भाजपा के कुछ कार्यकर्ता और पुलिस समय पर नहीं पहुंचते तो कोई बड़ी घटना भी हो सकती थी। 2 जून 1995 को घटी इस घटना ने सपा और बसपा के बीच जो खाई बनाई वह शायद ही कभी भर पाएगी।

यूपी दंगल, दांव पेंच का खेल शुरू


अजय शर्मा
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की राजनीति अत्यंत रोचक मोड़ पर आ पहुंची है। भारतीय जनता पार्टी ने इलाहाबाद में हुई राष्ट्रीय परिषद की बैठक के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बड़ी रैली करके अपने मिशन 2017 का आगाज कर दिया था। उसके बाद तो सभी राजनीतिक दल अपने अभियान में जुट गए। समाजवादी पार्टी की सरकार ने टेलीविजन और अखबारों में विज्ञापन अभियान चला रखा है, तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पूरे प्रदेश में रैलियां करने में जुट गए हैं। कांग्रेस ने भी लखनऊ और वाराणसी में रोड शो के बाद खाट सभाओं का आयोजन किया। तो वहीं बहुजन समाज पार्टी ने सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय रैलियों के जरिये अपनी ताल ठोकी।

बसपा ने शुरुआत में रैलियों के लिए जिन स्थानों को चुना, वे उसकी राजनीति के स्ट्रॉन्ग होल्ड के रूप में जाने जाते हैं। इनमें से दो जगह इलाहाबाद और सहारनपुर में नरेंद्र मोदी ने दो रैलियां की।  इसलिए बसपा ने उनकी रैली से बड़ी रैली करने की योजना बनाई। इलाहाबाद में तो वह इसमें कामयाब भी रही। सहारनपुर की रैली के लिए भी उन्होंने इसी रणनीति पर काम किया। दरअसल, नरेंद्र मोदी की रैली से बड़ी रैली करके और फिर उसका प्रचार करके बसपा ने एक साथ कई संदेश दिए। एक तो उसने यह बताने की कोशिश की, कि मुख्य मुकाबला भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच है, जिसमें बसपा अपनी मुख्य प्रतिद्वंद्वी से बीस है।
दूसरे, वह यह भी दिखाना चाहती थी कि समाजवादी पार्टी इस लड़ाई में कहीं नहीं है। इसके साथ ही बसपा यह दावा भी कर रही है कि वह अन्य दलों की तरह दूसरे क्षेत्रों व राज्यों के लोग इकट्ठे नहीं करेगी। बसपा का इरादा आस-पास के जिलों से अपने मतदाताओं और समर्थकों को इकट्ठा करना है। शुरू से ही बसपा का यह तरीका रहा हैै कि वह अपने मतदाताओं को एकत्र करती है और फिर उन्हें अपने काडर में तब्दील करती है। कई स्तरों पर उसके वोटर, सपोर्टर और काडर में बहुत ज्यादा फर्क नहीं रह जाता।

बसपा की रणनीति में सामाजिक समीकरण हमेशा से मुख्य भूमिका निभाते रहे हैं। दलित हमेशा से उसका मुख्य आधार रहे हैं, लेकिन इसके साथ ही अन्य जातियों और समुदायों को जोड़कर वह आगे बढ़ने की कोशिश करती है। सर्वजन का नारा भी इसीलिए दिया जा रहा है। इन रैलियों में दूसरी जातियों को लाने के अलावा मुस्लिम समुदाय को भी बड़ी संख्या में जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

दलित-मुस्लिम गठजोड़ उसकी रणनीति का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस बार बसपा का भविष्य बहुत हद तक इस गठजोड़ में उसकी कामयाबी से ही तय होगा। इसी वजह से रैलियों के लिए ऐसे स्थानों को चुना गया है, जहां दलित और मुस्लिम आबादी बड़ी संख्या में है। पार्टी ने इसके प्रयास दो-तीन साल पहले ही शुरू कर दिए थे। जिस तरह पिछली बार बसपा ने अपनी सोशल इंजीनियरिंग में ब्राह्मण-दलित गठजोड़ की केमेस्ट्री आधारतल तक फैलाने के लिए भाईचारा समितियां बनाकर शुरुआत की थी, उसी तरह 2017 के विधानसभा चुनाव के लिहाज से दलित-मुस्लिम गठजोड़ को मजबूत करने और उसकी चेतना आधार तल पर फैलाने के लिए उसने स्थानीय व क्षेत्रीय स्तर पर दलित-मुस्लिम नेताओं की कोर टीम बनाने का काम काफी पहले से शुरू कर दिया था। बसपा के कार्यकर्ता काफी समय से मुस्लिम बस्तियों में जाकर लोगों में यह धारणा बनाने की कोशिश कर रहे हैं कि सपा और भाजपा आपस में मिले हुए हैं।

खासकर मुजफ्फरनगर दंगों के बाद उस क्षेत्र में इस तरह के प्रचार का काम बड़े पैमाने पर किया गया। साथ ही मायावती के सत्ता में आने पर दंगे नहीं होंगे, ऐसे आश्वासन भी दिए जा रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि बसपा अल्पसंख्यक समुदाय के गरीबों को आरक्षण देने के लिए लड़ेगी। कई स्तरों पर बसपा पूरे मुस्लिम समुदाय के वोट पाने के लिए सक्रिय दिखाई देती है, तो कई स्तरों पर वह मुस्लिम समुदाय के पिछड़े समूहों, पसमांदा मुसलमानों आदि पर खास ध्यान दे रही है। अंसारी, गद्दी, ततवा, फकीर, हलालखोर, आदि सामाजिक समूहों की बस्तियों में बसपा की गतिविधियां बढ़ती जा रही हैं। इसके अलावा गरीब मुसलमान शब्द का भी वह काफी इस्तेमाल कर रही है। इन जातियों से अलग दूसरे गरीब वर्गों तक पहुंचने के लिए भी यह उसे जरूरी लगता है। मुसलमान मतदाताओं के साथ कुछ पिछड़ी जातियों को जोड़ने की बसपा की यह रणनीति नई नहीं है, बल्कि पार्टी संस्थापक कांशीराम के जमाने से ही चली आ रही है।

दलित-मुस्लिम गठजोड़ को मजबूत करने के लिए मायावती की दूसरी रणनीति है-  विधानसभा चुनाव 2017 में मुसलमानों को अधिक टिकट देना। बसपा ने इस चुनाव में 100 से ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे हंै। खासकर उन क्षेत्रों में, जहां मुसलमानों की आबादी काफी है। पार्टी का मानना है कि इस रणनीति से इन निर्वाचन क्षेत्रों में दलित व मुस्लिम गठजोड़ तो मजबूत होगा ही, इसके असर से अन्य क्षेत्रों में भी मुस्लिम मतदाता बसपा की ओर आएंगे।

मायावती अपने दलित आधार मतों से मुस्लिम मतों को स्टेपनी वोट के रूप में जोड़ने की रणनीति पर तो काम कर ही रही हैं, साथ ही सर्वजन के नारे को फैलाकर अन्य समुदायों, जैसे अति पिछड़ों, सवर्ण ब्राह्मणों और ठाकुर मतों को भी स्टेपनी के रूप में जोड़ने की रणनीति पर चल रही हैं। बसपा का आधार मत तो लगातार उसके पक्ष में संगठित रहा है। लेकिन उसकी जीत की कुंजी इस बात में है कि वह मुस्लिम, अति पिछड़ों और बाकी जातियों के मतों को स्टेपनी मत के रूप में अपने आधार मत से कितना जोड़ पाती है।

Wednesday, January 11, 2017

मायावती हर जिले में जनसभा करेंगी



विधानसभा चुनाव के लिए 401 सीटों पर सबसे पहले प्रत्याशी घोषित कर प्रतिद्वंद्वी दलों पर बढ़त बना चुकी बसपा प्रचार की रणनीति तय करने में लगी हैं। पार्टी अपनी मुखिया मायावती की चुनावी सभाओं को अंतिम रूप दे रही है।

अब तक मिल रहे संकेतों के मुताबिक बसपा अध्यक्ष पश्चिमी उत्तर प्रदेश से चुनाव प्रचार शुरू करेंगी। हर बार की तरह मायावती प्रत्याशियों के पक्ष में जिलों में एक-एक सभा करेंगी। अलबत्ता कम विधानसभा सीटों वाले छोटे जिलों की उससे लगे बड़े जिले में संयुक्त सभा कर सकती हैं। करीब पांच दर्जन चुनावी सभा करने की संभावना है।

बसपा सोनभद्र की दो विधानसभा सीटों को छोड़ कर बाकी सभी सीटों पर प्रत्याशी घोषित कर चुकी है। प्रत्याशियों की सूची जारी करने के बाद पार्टी आगे की रणनीति को धार देने में लग गई है। बसपा अध्यक्ष मायावती अपनी पार्टी की एकमात्र स्टार प्रचारक हैं। किसी भी चुनाव में उनकी सभा पार्टी प्रत्याशी के लिए मायने रखती है। यही कारण है कि बसपा अध्यक्ष की प्रत्याशियों और पार्टी पदाधिकारियों के साथ बीते दो दिन लगातार चली बैठक में प्रत्याशियों के पक्ष में होने वाली पार्टी मुखिया की सभाओं पर भी चर्चा हुई।

इस बार मायावती मेरठ या मुजफ्फरनगर से चुनाव प्रचार शुरू कर सकती हैं। कारण, अगस्त-सितंबर में मायावती ने प्रदेश में जो चार मंडलीय रैलियां की थी, उनमें आगरा और सहारनपुर शामिल था। सुरक्षा और अन्य कारणों से चुनावी सभा का मंच आदि की व्यवस्था का जिम्मा प्रदेश कार्यालय पर होगा। सब लखनऊ से होगा। बसपा अध्यक्ष के अलावा पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चन्द्र मिश्र, विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष नसीमुद्दीन सिद्दीकी, प्रदेश अध्यक्ष राम अचल राजभर समेत दूसरे नेता भी चुनावी सभाएं करेंगे।